भारत में अब तक लॉकडाउन बड़े देशों की तुलना में सफल रहा है और तमाम विशेषज्ञ जो कह रहे थे कि जून के अंत तक भारत में 30 से 50 लाख मरीज होंगे उस आंकड़े से भारत काफी दूर है जो राहत की बात है.
लेकिन हम और आप सब ये बात भी जानते हैं कि भारत में लॉकडाउन का पालन उस तरह नहीं किया गया, जैसे किया जाना चाहिए था और सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखने में लापरवाहियां बरती गयीं.
हर चरण में कुछ ऐसी घटनाएं रहीं जिन्न्होंने सोशल डिस्टेंसिंग का मजाक बना दिया..
१. मार्च 2020 में दिल्ली में तबलीगी जमात की बैठक २. प्रवासी मजदूरों का सड़कों पर उतरा रेला ३. लॉकडाउन में अस्थायी ढील के बाद शराब की दुकानों के बाहर भारी भीड़
सबसे बड़ी ट्रेजेडी इसमें प्रवासी मजदूरों के साथ हुई..जिन जिन राज्यों में वो कार्यरत थे उन राज्यों में अधिकारी वेतन, आश्रय और भोजन के रूप में कोई प्रोत्साहन नहीं दे सके, जिसके कारण उन्हें भारी तादाद में सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होना पड़ा। और जब राज्य प्रवासी मजदूरों का इंतजाम करने में असफल साबित हो रहे थे तभी उन्हें घर तक पहुंचाने के लिए सुचारु इंतजाम किए जाने चाहिए थे जैसे अभी किए गए हैं।
इस बीच सरकार ने एक काम जो अच्छा किया वो ये कि विदेश में बसे लगभग 10 लाख लोगों को लाने में पूरी मुस्तैदी बरती गयी..ये संख्या कुवैत पर इराक के आक्रमण के बाद लाए गए भारतीयों के मुकाबले बहुत अधिक संख्या है और भारत-पाक बंटवारे 1947-48 में भारत आए 70 लाख लोगों के बाद दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है।
लॉकडाउन के चरणों ने भले ही महामारी को कण्ट्रोल में रखा, लेकिन देश को/समाज को इसकी भारी आर्थिक कीमत चुकानी पड़ी है। देश में इकोनॉमिक एक्टिविटी लगभग बंद सी ही हैं….सभी कारोबारी चोट झेल रहे हैं, लाखों दिहाड़ी कामगार गरीबी में फंस गए हैं और बेरोजगारी अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गई है।
कोविड-19 से निपटने आत्मनिर्भर भारत की रणनीति बनाते समय ये बातें मुख्य रूप से याद रखी जानी चाहिए :
कोरोना कम से कम 2020 तक रहेगा ही.. जब तक इसकी दवाई नहीं बन जाती तब तक सोशल डिस्टेंसिंग का पालन तो करना ही होगा.
हमें जिंदगी और आजीविका दोनों बचाने पर जोर देना होगा। अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना प्राथमिकता होनी चाहिए..और समय-समय पर जरूरत के मुताबिक लॉकडाउन दोबारा लागू होने के लिए तैयार रहना होगा..
भारत में कोरोना का विस्तार uneven है….मामले महानगरों में अधिक रहे हैं और करीब आधा देश और अधिकतर ग्रामीण भारत इससे बचा हुआ है..
अधिकतर मामलों में बीमारी के हल्के लक्षण रहे हैं और अस्पताल में भर्ती होने वाले बहुत कम लोगों को आईसीयू में भर्ती किया गया था..
चीन और अमेरिका के बीच अविश्वास इस महामारी के कारण चरम पर है और वैश्वीकरण के बजाय स्थानीयकरण की मुहिम भी जोरों पर है। अमेरिका तथा जापान जैसे देशों के कारोबार को नया ठिकाना मुहैया कराने का मौका मिल रहा है। मगर हमें ध्यान रखना चाहिए कि आने वाले हफ्तों में चीन बाकी दुनिया के साथ ज्यादा अड़ियल रुख दिखाएगा..
आर्थिक मंदी के कारण तेल की कीमतें भी गिर गई हैं। भारत के लिए यह एक लिमिट तक वरदान है क्योंकि भारत को भारी मात्रा में तेल आयात करना पड़ता है। मगर एक लिमिट के बाद इसका यह नुकसान है कि खाड़ी से हमारे प्रवासियों द्वारा घर भेजी जा रही बेहद महत्वपूर्ण विदेशी मुद्रा आनी खत्म हो जाएगी क्योंकि उन लोगों की नौकरियों पर संकट खड़ा हो जाएगा। साथ ही उन्हें बड़ी तादाद में भारत लौटना भी होगा, जिससे रोजगार पर बोझ बढ़ जाएगा, जो पहले ही बोझ तले दबा है..
भारत इस बात से संतुष्ट हो सकता है कि उसके पास खाद्यान्न का बड़ा भंडार और भारी विदेशी मुद्रा भंडार तो है ही. आने वाले महीनों में मुफ्त खाद्यान्न वितरण कार्यक्रम के बावजूद अनाज की कमी नहीं आएगी। अधिकतर ग्रामीण भारत समेत करीब आधा देश वायरस से प्रभावित नहीं हुआ है..
देश इस बात से भी संतोष महसूस कर सकता है कि उसके मेडिकल सेक्टर और मेडिकल/पैरामेडिकल स्टाफ ने महामारी के दौरान शानदार काम किया है। साथ ही अक्सर रेलवे, बैंक, विमान और डाक सेवा जैसी जिन सेवाओं का आम दिनों में खास जिक्र नहीं किया जाता, संकट के दिनों में उन्होंने जीवनरक्षक सेवाओं का काम किया है और सशस्त्र बल हमेशा की तरह मुस्तैद रहे हैं.
लॉकडाउन के चलते प्रदूषण के स्तरों में नाटकीय गिरावट आई, जिससे हमें एक बार फिर ताजी हवा, साफ नदियों और नीले आसमान का लाभ और आनंद मिला है। इसने हमें बिना सोचे-विचारे अंधाधुंध खपत में लिप्त रहने के बजाय जरूरतें भर पूरी करने के पारंपरिक भारतीय मूल्यों की याद भी दिलाई है.
आगे की लड़ाई के लिए एक बात बिलकुल साफ़ है कि कोरोना से निपटने के साथ ही भारत को अपनी अर्थव्यवस्था को फौरन पटरी पर लाने पर भी ध्यान देना होगा…एक को नजरअंदाज कर केवल दूसरे पर ध्यान देना आत्मघाती होगा.
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इंसान छोड़िए साहब , हमें सबसे पहले जानवर बनने की कोशिश करनी चाहिये । सम्भव है कि हम सफ़ल हो जाएं क्योंकि इंसान बनने में तो विफल ही हुए हैं । इस खोखले इंसानी दिखावे ने और सर्वोच्च बनने की लालसा में बहुत दूर निकल आये हम । जहाँ केवल और केवल हम ही हम दिख रहे हैं । जब समाज में कोई अप्रिय घटना होती है तो हम ये पता लगाने कोशिश करते हैं कि इसकी जड़ क्या होगी ? कहाँ से इसने सीखा होगा ? इसी के चलने कभी पोर्न बन्द करने की बात आती है तो कभी कुछ । अब क्या बन्द करें हम ? घटना केरल की है । जब एक दुष्ट ने एक हथिनी को विस्फोट भर अनानास खिला दिया । जी हाँ , बारूद भर कर पाइनएप्पल ।। पेट में बच्चा लिए वो गर्भवती मूक बेचारी कई दिनों तक नदी में खड़ी रही , मुँह का जबड़ा भी कट गया और दाँत भी टूट गए । फ़िर आख़िर जिसका वो बेसब्री से इंतज़ार कर रही होगी , वही हुआ , मौत ने आखिर उसे गले लगा ही लिया । अगर मैं ये कहते हुए कि “अच्छा हुआ मौत ने उसे गले लगा लिया” अपराधी भी बन जाऊं तो भी ज़िम्मेदारी के साथ बनूँगा , ये उस बेचारी के दर्द से कहीं बेहतर था । डॉक्टर ने प्रयास किया , पर सफल ना हो सके । पेट की भूँख के कारण ये जानवर अपने बच्चों को सिखा नहीं पाते हैं कि किसी बाहरी अनजान से कुछ मत लेना । बच्चे छोड़िए इंसान महोदय , यहाँ तो ख़ुद माँ ही शिकार हो गई उद्दंडता का । और उसकी ममता भरे दिल ने इस पीढ़ा में भी किसी को चोंट नहीं पहुंचाई । वो तीन दिन का हर पर कितना पीढ़ादायक रहा होगा । उस हथिनी के तीन दिन तक नदी में मुँह और सूंड़ डूबे ही रहे । शायद शरीर में लग रही आग को ठंठा करना चाह रही हो । इंसान दर्द में चीख़ता है जानवर कई दफ़ा ख़ामोश हो जाते हैं । उसकी तकलीफ़ की गवाह तो नदी , उसकी मछलियाँ और वहाँ के पेड़ पौधे ही हैं । जब यही विकराल रूप ले , विनास का रूप लें , तो ईश्वर के पास मत भाग खड़े होना । भागोगे ये ज्ञात है । सवाल तो उठते हैं कि , कैंसे उसी हथिनी के पेट के कहीं कौने में वो नवजात अपनी , अपनी माँ की मृत्यु को महसूस कर रहा होगा ? आख़िर किस विश्वास के साथ उसने भोजन परोसने वाले के सामने अपनी सूंड़ बढ़ाई होगी , जो भोजन नहीं किसी राक्षसी ख़ुशी के लिए उसे मौत परोस रहा होगा ? आख़िर कैंसे ?? 😢😢
#riphumanity
#RIP_humanity
मानवता को शर्मशार करने वाले कुकृत्य
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Well if you check the fat percentage of banana 100 gm of banana has hardly 0.3 gram of fat contained in it so the myth that banana is full of fat is wrong. 🤣🤣
𝘿𝙤𝙚𝙨 𝙞𝙩 𝙢𝙖𝙠𝙚 𝙪𝙨 𝙛𝙖𝙩? 🧐🧐
Well, the prescription is that banana is high in sugar and calories and thus it makes us FAT.
LET’S BREAK SOME MYTHS 😤😤
Banana is NOT full of Sugar: 100 gm banana has about 12 gm of Sugar that is relatively less than the modern processes foods. For instance, 100 gm of Digestive cookies has 22 gm Sugar. ❌❌
It is NOT high in Calories: The calories in bananas are moderate enough to include in your diet without causing weight gain. A small banana contains 90 calories, and even an extra-large banana only has 135 calories. ❌❌
It is NOT Full of Starch: Bananas contain more starch than some other fruits, but that doesn’t mean they’ll make you fat. It’s important to consider the type of starch, its calories and its overall impact on blood sugar. Bananas are one of the best sources of a type of starch called resistance Starch which, in your body, acts the same as soluble fibre. It passes through the small intestine without being digested, so it doesn’t contribute the same calories as starch that’s digested into sugar and used for energy. ❌❌
It CAN be consumed by Diabetics patients also: Although it’s not a free food for Diabetics it is low in Glycemic index which means the Sugar present in the bananas is absorbed in the body slowly thus it doesn’t spike the insulin in your body. It can be consumed by diabetics patients in moderate amount. ❌❌
Potassium: 9% of the RDI Vitamin B6: 33% of the RDI Vitamin C: 11% of the RDI Magnesium: 8% of the RDI Copper: 10% of the RDI Manganese: 14% of the RDI Net carbs: 24 grams Fiber: 3.1 grams Protein: 1.3 grams Fat: 0.4 grams
BOTTOM LINE
Banana is any day better than the readily available so-called healthy snack available at supermarkets these days. It is a snack that is easily available anywhere if you are travelling or working. You can easily buy it a local grocery shop or a roadside vendor. It doesn’t mean you can have as much banana as you like but if eaten in moderate amount, it can even help you in losing weight. 🍌🍌🐒🐒
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बिहार बोर्ट टॉपर हिमांशु राज (Bihar Board Topper Himanshu Raj) कहते हैं कि कई बार वो अपने पिता के साथ सब्जी बेचने बाजार जाता था. अब वो चाहता है कि कुछ बन कर परिवार की मदद कर सके. उसने बताया कि सेल्फ स्टडी के अलावा उसने कोचिंग भी की. पिता भी ट्यूशन पढ़ाते हैं तो उनका भी मार्गदर्शन उसे मिलता रहा।
पटना/रोहतास. बिहार बोर्ड के दसवीं के नतीजे (Bihar Board Matric Result) घोषित हो गए हैं. इसमें रोहतास के जनता हाईस्कूल के छात्र हिमांशु राज (Himanshu Raj) ने 96.20 प्रतिशत अंक (500 में 481 अंक) लाकर टॉप किया है. जबकि समस्तीपुर के दुर्गेश कुमार (Durgesh Kumar) 480 नंबर लाकर सेकेंड टॉपर बने हैं. भोजपुर के शुभम कुमार (Shubham Kumar) ने 478 नंबर लाकर तीसरा स्थान हासिल किया है. बता दें कि 478 नंबर लाने वाले दो और स्टूडेंट हैं. इनमें से एक औरंगाबाद के राजवीर और दूसरी अरवल की जूली कुमारी हैं. न्यूज़ 18 ने बोर्ड परीक्षा में अव्वल आने वाले हिमांशु राज से बात की तो उन्होंने बताया कि उनके पिता के कठिन परिश्रम और मेरे संकल्प के कारण जीवन में सफलता का यह क्षण आया है।
हिमांशु ने बताया कि वो साइंस स्ट्रीम के साथ आगे की पढ़ाई करेंगे और एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनना चाहते हैं. हिमांशु ने बताया कि वो करीब 12 से 14 घंटे रोज पढ़ाई करते थे जिसके बाद उन्हें यह सफलता मिली है. हिमांशु के स्कूल के प्रिंसिपल उपेंद्र नाथ ने बताया कि ग्रामीण परिवेश से आने वाला हिमांशु बचपन से मेधावी है. हम सब उसकी सफलता से बेहद खुश हैं. वहीं हिमांशु के पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में बताते हैं कि उसकी बहन ने भी मैट्रिक की परीक्षा में 88 प्रतिशत अंक लाया था।
हिमांशु ने बताया कि वो साइंस स्ट्रीम के साथ आगे की पढ़ाई करेंगे और एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनना चाहते हैं. हिमांशु ने बताया कि वो करीब 12 से 14 घंटे रोज पढ़ाई करते थे जिसके बाद उन्हें यह सफलता मिली है. हिमांशु के स्कूल के प्रिंसिपल उपेंद्र नाथ ने बताया कि ग्रामीण परिवेश से आने वाला हिमांशु बचपन से मेधावी है. हम सब उसकी सफलता से बेहद खुश हैं. वहीं हिमांशु के पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में बताते हैं कि उसकी बहन ने भी मैट्रिक की परीक्षा में 88 प्रतिशत अंक लाया था।
हिमांशु राज के पिता सुभाष सिंह ग्रेजुएट हैं और माता मंजू देवी पांचवीं पास हैं. पिछड़ी कुशवाहा जाति से आने वाले हिमांशु के पिता की एक-आधा बीघे की खेती है. वो ग्रामीण स्तर पर ट्यूशन पढ़ाते हैं और सब्जी उगाकर उसे बेचते भी हैं।
इसी खपरैल विद्यालय में पढ़कर स्टेट टॉपर बना है हिमांशु राज
‘कई बार पिता के साथ सब्जी बेचने जाता था’
हिमांशु ने न्यूज़ 18 से कहा कि उसके पिता काफी संघर्ष कर उसे पढ़ा-लिखा रहे हैं. दरअसल उनकी कोई खास जमीन नहीं है. लोगों से खेत बटाई पर लेकर वो खेती करते हैं. यही वजह रही कि कई बार आर्थिक परेशानी भी हुई लेकिन पढ़ाई फिर भी जारी रही. हिमांशु कहते हैं कि कई बार वो अपने पिता के साथ सब्जी बेचने बाजार जाता था. अब वो चाहता है कि कुछ बन कर परिवार की मदद कर सके. हिमांशु ने बताया कि उसका वेरिफिकेशन किया गया था, लेकिन टॉपर होने की बात का अंदाजा नहीं था. उसने बताया कि सेल्फ स्टडी के अलावा उसने कोचिंग भी की. पिता भी ट्यूशन पढ़ाते हैं तो उनका भी मार्गदर्शन उसे मिलता रहा।
हिमांशु के पिता सुभाष सिंह ने कहा कि यह सपने के सच होने जैसा है. गुरबत (गरीबी) में भी मेरे लाल ने सपना पूरा किया इसके लिए भगवान का बहुत धन्यवाद. उन्होंने कहा कि बेटे की प्रतिभा को देखते हुए उनकी कोशिश होती थी कि वो डिस्टर्ब न हो. पूरे परिवार ने उसका सपोर्ट किया और बेटे ने आज सपना पूरा कर दिखाया।
बिहार बोर्ड के 10 टॉपर स्टूडेंट
हिमांशु राज, कुल नंबर (481) – रोहतास
दुर्गेश कुमार, कुल नंबर (480) – समस्तीपुर
शुभम कुमार, कुल नंबर (478) – भोजपुर
मुन्ना कुमार, कुल नंबर (477) – औरंगाबाद
रंजीत कुमार गुप्ता, कुल नंबर (476) – रोहतास
अंकित राज, कुल नंबर (475) – अररिया
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भारतीय पिता पुत्र की जोड़ी भी बड़ी कमाल की जोड़ी होती है । दुनिया के किसी भी सम्बन्ध में , अगर सबसे कम बोल चाल , किसी सम्बन्ध में है , तो वो पिता पुत्र की जोड़ी में है । एक समय तक दोनों अंजान होते हैं एक दूसरे के बढ़ते शरीरों की उम्र से फिर धीरे से अहसास होता है हमेशा के लिए बिछड़ने का । जब लड़का , अपनी जवानी पार कर अगले पड़ाव पर चढ़ता है तो यहाँ इशारों से बाते होने लगती हैं या फिर इनके बीच मध्यस्थ का दायित्व निभाने वाली माँ के माध्यम से । जो “उससे कहा देना” और “पापा से पूछ लो ना” के बीच घूमती रहती है । जब एक कहीं होता है तो दूसरा नहीं होने की कोशिश करता है , शायद नज़दीकी से डरते हैं । वो डर नज़दीकी का नहीं है , डर है उसके बाद बिछड़ने का । भारतीय पिता ने शायद ही किसी बेटे को कहा हो कि बेटा मैं तुमसे बेइंतहा प्यार करता हूँ । पिता की अनंत गालियों का उत्तराधिकारी भी वही होता है , क्योंकि वह हर पल ज़िन्दगी में अपने बेटे को अभिमन्यु सा पाता है । पिता समझता है , की इसे सम्भलना होगा , इसे मजबूत बनना होगा , ज़िम्मेदारियो का बोझ इसका वध नहीं कर सकतीं । मैं चला जाऊँगा , इसकी माँ चली जाएगी , बेटियाँ अपने घर चली जायँगी , रह जाएगा ये , इसे हर दम परिवार के लिए , बहु के लिए , बच्चों के लिए लड़ना होगा । पिता जानता है हर बात घर नहीं बताई जा सकती , इसलिए इसे खामोशी में ग़म छुपाने सीखने होंगे । परिवार के विरुद्ध खड़ी हर विशालकाय मुसीबत को अपने हौंसले से छोटा करना होगा। ना भी कर सके तो ख़ुद का वध करना होगा । इसलिए वो कभी पुत्र-प्रेम प्रदर्शित नहीं करता , वो जानता है प्रेम कमज़ोर बनाता है । फिर कई दफ़ा उसका प्रेम झल्लाहट या गुस्सा बनकर निकलता है । वो अपने बेटे की कमियों मात्र के लिए नहीं है , वो झल्लाहट , निकलते समय के लिए है , वो जानता है उसकी मौजूदगी की अनिश्चितताओ को । वो चाहता है कहीं ऐसा ना हो इस अभिमन्यु का वध मेरे द्वारा दी गई कम शिक्षा के कारण हो जाये , वो जल्द से जल्द सीख ले , वो गलतियाँ करना बंद करे , क्योंकि गलतियां सभी की माफ़ हैं पर मुखिया की गलतियां माफ़ नहीं होती , यहाँ मुखिया का वध सबसे पहले होता है । फिर एक समय आता है कि पिता और बेटे दोनों को अपनी बढ़ती उम्र का एहसास होने लगता है , बेटा अब केवल बेटा नहीं , पिता भी बन चुका है , कड़ी कमज़ोर होने लगती है । पिता का सिखा देने की लालसा और बेटे की उस भावना को नहीं समझ पाने के कारण , वो सौम्यता भी खो देते हैं यही वो समय होता है जब बेटे को लगता है कि उसका पिता ग़लत है , बस इसी समय को समझदारी से निकालना होता है , वरना होता कुछ नहीं है , बस बढ़ती झुर्रियां और बूढ़ा होता शरीर जल्द बीमारियों को घेर लेता है । फिर सभी को बेटे का इंतज़ार करते हुए माँ तो दिखी पर पीछे , रात भर से जागा पिता नहीं दिखा , पिताओं की झुर्रियां बढ़ रही हैं । ये समय चक्र है , जो बूढ़ा होता शरीर है बाप के रूप में उसे एक और बूढ़ा शरीर झांक रहा है आसमान से , जो इस बूढ़े होते शरीर का बाप है , कब समझेंगे बेटे , कब समझेंगे बाप , कब समझेगी दुनिया , ये इतने भी मजबूत नहीं , तुम्हें पता है क्या होता है उस आख़िरी मुलाकात में , जब , जिन हाथों की उंगलियां पकड़ पिता ने चलना सिखाया था वही हाथ , लकड़ी के ढेर पर पढ़े नग्न पिता को लकड़ियों से ढकते हैं , उसे तेल से भिगोते हैं , उसे जलाते हैं , ये कोई पुरुषवादी समाज की चाल नहीं थी , ये सौभाग्य नहीं है , यही बेटा होने का अभिशाप है । ये होता है , हो रहा है , होता चला जाएगा । जो नहीं हो रहा , और जो हो सकता है , वो ये की हम कह दें , हम कितनी मोहब्बत करते हैं।
इसकी शुरुआत में कुछ ऐसे करूंगा कि जब मिखाइल गोर्बोच्योव ने अपनी बायोग्राफी में लिखा है। यूरोप में अध्ययन के दौरान उन के साथ कुछ जापानी भी पढते थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जापान का पतन हो चुका था। आर्थिक प्रतिबंध थे। जब क्लास चल रही होती थी तो ये दो जापानी छात्र बारी बारी से लिखते थे क्योंकि एक लिखता था तो दूसरा पेंसिल छील कर तैयार करता था क्योंकि जापानी पेंसिल उस समय तक अच्छी गुणवत्ता की नही थी इसलिये पेंसिल बार बार टूट जाती थी। दूसरे छात्रों ने कहा तुम अच्छी पेंसिल (इंग्लैंड वाली /अमेरिका) क्यों नही काम लेते इतनी महंगी भी नही। जापानी छात्र बोले, आंखों में आंसू थे। जब हमारी चीज को हम ही नही खरीदेंगे तो दूसरा क्यों खरीदेगा। भले ही आज हम अच्छे नही फिर भी एक दिन ऐसी पेंसिल बनाएंगे की दुनिया उपयोग करेगी। स्व पर गर्व करना ही पड़ेगा तभी दुनिया तुम पर गर्व करेंगी। बिना उपयोग के कैसे अच्छे product बना लोगे। उपयोग होता है वहीं research व Development की संभावनाए ज्यादा होती है ।
यह कोई कहानी नहीं है यह एक आपबीती है जो जापान के दार्शनिक ने अपनी बायोग्राफी में लिखिए जब एक बच्चा अपने देश हित के बारे में इतना सोच सकता है। तो यह सोचकर सुनकर पढ़कर कितना गर्व महसूस होता है कि ऐसे बच्चे भी देश में हैं जो अपने देश के हित के बारे में इतना कुछ सोचते हैं आज सबको पता है जापान अपने आप में विकासशील देश है कितना प्रगति पर है तो किसी को आत्मनिर्भर का सबसे सरल उदाहरण देखना हो तो जापान को देखिए उनका भी वही नारा था जो आज हमारा है कि स्वदेशी अपनाओ विदेशी भगाओ, देश में रहो, देश में खाओ, देश में घूमो और देश का पहनो।
“इस तरह पूर्ण हुआ जापान का आत्मनिर्भर अभियान!!”
अब बारी है हिंदुस्तान की जैसा कि हम सभी इस त्रासदी से गुजर रहे हैं कोविड-19 से बोलते हैं। मैं आह्वान करता हूं, पूरे हिंदुस्तान से की जो उस समय जापान ने किया। आज वह हमें करने की बहुत जरूरत है। (“लोकल बने वोकल बने”) अपने देश की बनी हुई चीजों को इस्तेमाल गर्व से करें और पूर्ण उत्साह से उसका प्रचार भी करें।
तो हिंदुस्तान क्या आप तैयार हैं कि घर उसे अपने देश में बनी हुई चीजों का इस्तेमाल करने में अपने देश में घूमने के लिए और इस तरह से प्रचार करेगी कि बाहर के लोग भी हमारे देश में आए हमारी बनी हुई चीजों को इस्तेमाल करें हमारे बने हुए घूमने वाले स्थानों पर घूमे हम अपने देश का बना हुआ खाना ही खाएं देश की चीजों को इस्तेमाल करें स्वदेशी अपनाएं विदेशी भगाएं गर्व से हिंदुस्तानी बनकर अपने नाम अपने देश का नाम बढ़ाएं गर्वित करें तो अगर आप तैयार हैं तो कमेंट करिए गा शेयर करिएगा मेरे पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लोगों पर।
धन्यवाद
🙏”आत्मनिर्भर भारत अभियान सम्पूर्ण“🙏🇮🇳
जय हिंद जय माँ भारती 🙏
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रक्त चाप (BP), रक्त वाहिकाओं की बाहरी झिल्ली पर रक्त संचार द्वारा डाले गए दबाव है और यह प्रमुख जीवन संकेतो में से एक है। संचरित रक्त का दबाव, धमनियों और कोशिकाओं के माध्यम से हृदय से दूर और नसों के माध्यम से हृदय की ओर जाते समय कम होता जाता है। जब अर्थ सीमित ना हो, तब सामान्यतः रक्त चाप शब्द से तात्पर्य बाहु धमनीय दाब है: अर्थात् बाईं या दाईं ऊपरी भुजा की मुख्य रक्त वाहिका, जो रक्त को ह्रदय से दूर ले जाती है। तथापि, रक्त चाप को कभी-कभी शरीर के अन्य भागों में भी मापा जा सकता है, जैसे टखनों पर. टखने की मुख्य धमनी से मापा गया रक्त चाप और बाहु रक्त चाप का अनुपात, टखना बाहु चाप दर्शाता है।
समानता अगर रक्त चाप 120/80 हो तो सामान्य माना जाता है।
We usually measure blood pressure by B.P. Monitoring Machine ….
This is machine we use to measure blood pressure & we called it “Sphygmomano Meter”
जब रक्त चाप 120 से ज्यादा हो तो उच्च रक्त चाप और 80 से कम हो तो निम्न रक्त चाप माना जाता है और इसके साथ ये भी देखा जाता है कि हमारे दिल 1 मिनट में कितने बार धड़कता है। सामान्यता एक मिनट में 72 बार धड़कता है और इसे beat per minute b/m में चेक करते हैं।
“उच्च रक्तचाप को हाइपरटेंशन एंड निम्न रक्त चाप को हाइपोटेंशन कहाजाता है।”
हाइपरटेंशन वाले व्यक्ति को नमक से बनी चीज का सेवन करना चाहिए( मीठा, तला हुआ ज्यादा मिर्च मसाले वाले खाने से बचना चाहिए) और हाइपोटेंशन वाले को मीठा (Energy) वाला खाने को देना चाहिए।
मुख्य कारण क्या है रक्तचाप के बिगड़ने का
1.शारीरिक गतिविधियों को कम होना।
2. पाचन शक्ति का सही से काम ना करना।
3. आराम परस्त जीवन शैली का होना।
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आइए आज हम सोशल मीडिया की बात करेंगे तो सोशल मीडिया इन शॉर्ट में तो वह प्लेटफार्म में जहां पर हम अपने विचार एक दूसरे के सामने रख सकते हैं आजकल सोशल मीडिया का इस्तेमाल सिर्फ एंटरटेनमेंट के लिए हो रहा है और जैसा कि सभी जानते हैं की जरूरत से ज्यादा किसी भी चीज का इस्तेमाल या किसी चीज हमारे लिए अच्छा नहीं है तो आइए जानते हैं थोड़ा सा सोशल मीडिया के नुकसान के बारे में दुष्प्रभाव जो हम पर होते हैं
आज के दौर में सोशल मीडियाकिसी के लिए भी कोई अनजान शब्द नहीं है। इसके बारें मे बड़ें हो या बच्चे सभी जानते हैं, क्योंकि सोशल मीडिया के जरिए ही अब दुनिया की सभी जानकारियां और जरूरत की हर चीज सिर्फ एक क्लिक की दूरी पर है। वैसे तो सोशल मीडिया जहां एक वरदान के रूप में सबसे पहले सामने आया था। लेकिन इसके बढ़ते नकारात्मक असर की वजह से अब यह एक अभिशाप बनता जा रहा है। लेकिन इसके बढ़ते प्रभाव से हम चाहकर भी खुद को दूर नहीं रख सकते हैं। इसका असर आप और हमें बीमार बनाने के साथ ही हमारे आत्म सम्मान को कम करने का भी काम कर रहा है। जिसके बारे में हमें कोई एहसास ही नही है। इसलिए आज हम आपको इसके बारे में बताने जा रहे हैं जो आपको शारीरिक और मानिसक रूप से बीमार करने के साथ ही आपके आत्म सम्मान को भी कम रहा है
1. सोशल मीडिया द्वारा धोखाधड़ी होती हैं
2. सोशल मीडिया द्वारा हैकिंग की जाती है
3. सोशल मीडिया के ज्यादा इस्तेमाल से आपको Mobile Addiction यानी लत लग जाती है हो सकता हैं
4. सोशल मीडिया के कारण लोग बहुत समय बर्बाद करते हैं
5. कईं बार सोशल मीडिया मौत का कारण बनता है।
6. सोशल मीडिया के द्वारा आपका प्राइवेट डेटा लीक हो सकता है।
7.चूँकि सोशल मीडिया का इस्तेमाल मोबाइल और कंप्यूटर पर किया जाता है जिसे आपकी हेल्थ पर प्रभाव पड़ता है।
8. सोशल मीडिया आपको अपने दोस्तों और परिवार से दूर कर देता है।
9. सोशल मीडिया पर बहुत सारे फ़के लोग मौजूद होते है।
10. सोशल मीडिया की दुनिया आपको असल दुनिया से अलग कर देती है।
तो दोस्तों Social Media के लाभ और हानि दोनों है परन्तु यह आप पर निर्भर करता है कि आप Social Media का इस्तेमाल किसी प्रकार करते हैं क्योंकि यह आपकी जिंदगी बदल सकता हैं और बर्बाद भी कर सकता हैं।
अगर आज के समय की बात की जाये तो Social Media हमारी जिंदगी से जुड़ चुका है इसलिए आज हम असल दुनिया से ज्यादा सोशल दुनिया मे अपने दोस्त बनाते है और अपने विचारों को दूसरों के साथ शेयर करते है।
लेकिन सबसे जरूरी बात यह है कि यह मनुष्य द्वारा हमारे इस्तेमाल के लिए बनाये गये है ना कि यह हमारा इस्तेमाल करें इसलिए ज़रूरत के हिसाब से ही Social Media का इस्तेमाल करें और व्यर्थ समय नष्ट न करें।
पर आज समाज में social मीडिया ने एक अलग ही रूप ले लिया है जो धीरे धीरे जहर की तरह समाज को खोखला और निकम्मा बना दिया है। जी हाँ में बात कर रहा हूँ हाल में सबसे ज्यादा चर्चित Tik Tok जिसे आप सभी अच्छे से जानते हैं जो कि Advance version है Musically app जो कि एंटरटेनमेंट के लिए बनाई गई थी।
जितना मैं समझता हूं “एंटरटेनमेंट जिंदगी में होना बहुत जरूरी पर एंटरटेनमेंट ही जिंदगी है ये मानना पूर्णता गलत है” हमारा सबसे पहले कर्तव्य है कि हमारे देश की तरक्की के लिए काम करें अपने परिवार का पालन पोषण करे। पर आज टिक Tik Tok में हमारे युवाओं को राह से भटका दिया है। “छोटे बच्चों, बुजुर्गों के लिए तो फिर भी ये किसी हद तक ठीक है क्योंकि वे इसे एंटरटेनमेंट के लिए प्रयोग करते हैं” लेकिन हमारे युवा जिन्हें देश की रीढ़ की हड्डी कहा जाता है देश को प्रगति की और ले जाना जिनका काम है वो आज देश में देश विरोधी, धर्म विरोधी ,समाज विरोधी कृत्यों को बढ़ावा दे रहे हैं। “जो भी हमारे देश को बांटने का काम करती है वह हमारे लिए सही कैसे हो सकती है” तो मैं आह्वान करता हूं सभी युवाओं को और कहता हूँ कि जागो हे देश के युवा और सोचो कि आप लोग क्या कर रहे हो,अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा लौट आओ। एक कहावत है “जब जागो तब सवेरा” में ये नही कहता कि tik tok को हटा दीजिए,इसका फैसला आप खुद किजिए।
आइए देखते हैं Tik tok में क्या हो रहा है,में क्यों इसके विरोध में हूँ खुद देखिए।
जैसा कि हम सभी को पता है कि अभी तक कोरोना संक्रमण की कोई भी दवा नही बनी सकी है और दुनियाँ भर के वैज्ञानिक रात-दिन इसी प्रयासरत है कि जल्द से जल्द इस महामारी की दवा बन कर इसका उपचार संभव हो सके। ऐसी अवस्था में आज हमें यह जानना बहुत आवश्यक है कि अभी तक जो भी लोग इस लाइलाज महामारी, कोरोना से स्वस्थ हुए है वह सिर्फ और सिर्फ अपनी स्वयं की रोग-प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी, साधारण शब्दों में हम इसे शरीर की वह शक्ति जो रोगों से लड़ने का काम करती है और हमें उनसे बचाती है के रूप में जानते है) से ही ठीक हुए है। अधिकांश लोगों की ऐसी धारणा है कि यह महामारी एक बार तो सबको ही होनी है और जिसकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) अधिक/अच्छी होगी वह सुरक्षित रहेगा और जिसकी कम/अच्छी नहीं होगी वह नहीं बचेगा, अर्थात हमारे शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) ही कोरोना की वास्तविक दवाई है। यदि हम इस महामारी को मात देना चाहते है तो हम सभी को अपना सारा ध्यान अपनी रोग-प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) को बढ़ाने पर केंद्रित करना होगा। हमे यह जानने/सीखने की परम आवश्यकता है कि किस-किस खाद्य पदार्थ एवं आचार-विचार से रोग-प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) बढ़ती है और किस-किस से घटती है….!!
प्रथम रोग-प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) बढ़ाने वाले खाद्य पादर्थ एवं आचार-विचार पर ध्यान देते है;
योग, प्राणायाम एवं ध्यान
व्यायाम या कोई शारीरिक खेल
घर का बना ताज़ा एवं शुद्ध शाकाहारी भोजन
आंवला (किसी भी रूप में)
फल (खासकर खट्टे फल)
हरी सब्जियाँ
दालें
गुड़ एवं शक्कर
शुद्ध तेल कोई भी (रिफाइंड बिल्कुल नहीं)
तुलसी व अन्य आयुर्वेदिक पेय पदार्थ।
दूध और दूध से निर्मित दही, मक्खन, लस्सी, घी इत्यादि।
सूर्य की रोशनी में सवेरे तेल मालिश करने से भी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। विटामिन-डी रोग प्रतिरोधकता के लिए महवपूर्ण कारक है।
सब्जियों का सूप पीना रोग-प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) को तो बढ़ाता ही है, सर्दी-जुकाम आदि विकारों में भी बहुत लाभकारी है।
दिन में कम से कम दो बार गर्म पानी और काढ़े का सेवन करने से भी रोग-प्रतिरोधकता में वृद्धि होती है।
शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) घटाने वाले खाद्य पदार्थ एवं आचार-विचार;
मैदा (सबसे विनाशकारी पदार्थ, किसी भी रूप मे जैसे ब्रेड, नान, भटूरे, बर्गर, पिज़्ज़ा, जलेबी, समोसा, कचोरी, पाव (पाव भाजी वाला) इत्यादि बिल्कुल भी न खाए।
रिफाइंड आयल बिल्कुल न खाए।
चीनी बिल्कुल नहीं खाए इसके स्थान पर गुड़ , शकर, खांड़ खाए।
मासाहारी एवं बाहर का कोई भी जंक फूड न खाएं।
मैदा और चीनी से बने खाद्य पदार्थ/व्यवज़ बिल्कुल न खाएं जैसे बर्गर, पिज़्ज़ा, जलेबी इत्यादि।
एल्युमीनियम के बर्तनों में खाना बनाना और खाना तुरंत बन्द करें।
कोल्ड ड्रिंक, आइसक्रीम आदि ठंडे पादर्थ का सेवन बिल्कुल नहीं करें।
पैकिंग वाले खाद्य पदार्थों को न खाए या कम से कम खाए।
रात को देर से भोजन करना और देर रात तक टेलीविजन, कंप्यूटर और मोबाइल आदि का उपयोग करने से बचें।
सुबह देर तक सोना और दोपहर तक भूखे पेट रहना, इस दिनचर्या में सुधार करें।
ठंडा भोजन करने से भी रोग-प्रतिरोधकता कम होती है।
अत्याधिक शारीरिक या मानसिक कार्य करना और उसके अनुरूप अच्छी नींद/पूर्व विश्राम नहीं करना अर्थात कम सोना भी इस क्षमता के स्तर में गिरावट लाता है।
इस तरह इन बातों को अपनाकर आप अपनी रोग-प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) को इतना मजबूत बना सकते हो कि आप कोरोना को भी सहजता से मात दे सको। यह बात ध्यान रहे कि अभी तक आपकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता अर्थात इम्युनिटी ही कोरोना का एकमात्र उपचार एवं समाधान है….!
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पांरपरिक चीनी उपचार में पिछले 2000 वर्षों से एक्यूप्रेशर थेरेपी का एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है और आज भी इसका उपयोग सारी दुनिया में किया जा रहा है। यह तथ्य बीमारी और दर्द के उपचार में एक्यूप्रेशर थेरेपी के लाभ का प्रमाण है।
एक्यूप्रेशर शरीर की स्वयं को ठीक करने और व्यवस्थित करने की क्षमता को जगाने के लिए संकेत भेजने की एक तकनीक है। जिस तरह योग में प्राण (जीवन शक्ति) को बहुत महत्त्व दिया जाता है, उसी तरह पारंपरिक चीनी उपचार में “की या क्यूई” (Qi) (जीवन ऊर्जा) का महत्व है। ऐसा माना जाता है कि हमारे शरीर के अंदर इस जीवन ऊर्जा का प्रवाह कुछ नलिकाओं के माध्यम से होता है, जिन्हें “मेरीडियन” कहते हैं।
इस प्राकृतिक प्रवाह में रुकावट या “यिन” (yin) और “यांग” (yang) का असंतुलन बीमारी और दर्द का कारण हो सकता है। एक्यूप्रेशर इस असंतुलन को सही करके जीवन ऊर्जा के प्रवाह में सुधार लाता है, इससे शरीर अपनी प्राकृतिक स्वस्थ अवस्था में आ जाता है।
एक्यूप्रेशर बिन्दु या एक्यूप्रेशर पॉइंट ?
एक्यूप्रेशर पॉइंट, शरीर पर एक ऐसा बिंदु होता है जिस पर दबाव डाला जाता है, ऐसे बिंदु को प्रेशर पॉइंट भी कहा जाता है।
वैसे तो मानव शरीर में 1000 से ज्यादा एक्यूप्रेशर पॉइंट होते हैं लेकिन इन पॉइंट को समझने के लिए हम अलग प्रक्रिया करते हैं। सभी एक्यूप्रेशर पॉइंट को हम 14 अलग-अलग भागों में बांटते हैं और इन 14 भागो को हम मेरीडियन कहते हैं।
यह 14 मेरिडियन इस प्रकार है:-
Lungs, Large Intestine, Stomach, Spleen, Heart, Small Intestine, Urinary Bladder, Kidney, Pericardium, Triple Warmer, Gall Bladder, Liver, Conceptional, Governing Vessel.
एक्यूप्रेशर हम शरीर के अलावा कान,हाथ,पैर पर चेहरे पर कर सकते हैं और एक्यूप्रेशर से हम नाभि का उपचार भी कर सकते हैं।
एक्यूप्रेशर कैसे करे ?
एक्यूप्रेशर थेरेपी निम्न चरणों में पूरी की जाती है –
एक्यूप्रेशर बिंदु पर हल्का दबाते हुए मालिश करें। जब एक्यूप्रेशर बिंदु पर मालिश करें, तब आराम से किसी सुविधाजनक जगह पर बैठ जायें और अपनी आँखें बंद करके गहरी साँस लें। मालिश को जब आप को पंसद हो तब बार-बार करते रहे। एक दिन में कितनी बार करें इसका कोई नियम नहीं हैं, जितनी बार आपको सुविधाजनक लगे उतनी बार कर सकते हैं। आप स्वयं इन एक्यूप्रेशर बिंदुओं की मालिश कर सकते हैं। या किसी अन्य की भी मदद ले सकते हैं। हालाँकि, एक्यूप्रेशर के किसी अच्छे जानकर से मालिश करवाना अधिक सुरक्षित होता है।
एक्यूप्रेशर कैसे काम करता है –
एक्यूप्रेशर थेरेपी शरीर के निश्चित बिंदुओं पर दबाव डालकर “की” (Qi) नामक जीवन ऊर्जा के प्रवाह को बढ़ाती है। इस तरह दबाव डालने के लिए काफी बारीकी से काम करना पड़ता है क्योंकि हमारे शरीर के अंदर मुख्य चैनल्स (मेरीडियन) पर 193 बिंदु हैं और इसके अलावा 670 अन्य बिंदु हैं। रक्त वाहिकाओं के तंत्र की तरह इन चैनल्स के भी अपने कनेक्शन के नेटवर्क होते हैं।
इन चैनल्स में “की” ऊर्जा को प्रभावित करने के लिए अलग-अलग तकनीकों का उपयोग किया जाता है। इसमें शामिल हैं – मजबूत करना, फैलाना या शांत करना। कमजोर “की” ऊर्जा को मजबूत किया जाता है, रुकी हुई “की” ऊर्जा को फैलाया जाता है और अधिक सक्रिय “की” ऊर्जा को शांत किया जाता है।
एक्यूप्रेशर बिंदुओं पर सामान्य रूप से कुछ सेकंड से कुछ मिनट तक दबाव दिया जाता है। एक्यूप्रेशर बिंदुओं की मालिश या इन बिंदुओं को किसी चीज़ से दबाकर या दोनों तरीकों को एक साथ उपयोग करके इनपर दबाव डाला जाता है।
हालाँकि, जिन एक्यूप्रेशर बिंदुओं पर दबाव डाला जाता हैं वो सवेंदनशील हो सकते है लेकिन एक्यूप्रेशर से दर्द नहीं होना चाहिए। बीमारी की स्थिति के हिसाब से उपचार हर दिन या फिर दिन में कई बार दिया जा सकता है।
एक्यूप्रेशर के लाभ –
एक्यूप्रेशर से होने वाले स्वास्थ्य लाभ के बारें में अधिक शोध नहीं हुआ है। हालाँकि, निम्न लिखित परेशानियों में एक्यूप्रेशर से लाभ मिल सकता हैं –
मतली – कुछ शोधों के अनुसार कलाई के एक्यूप्रेशर से मतली और उलटी का उपचार किया जा सकता हैं। कैंसर – एक्यूप्रेशर थेरेपी कीमोथेरेपी से कैंसर के उपचार के तुरंत बाद होने वाली मतली से बचाती है और यह तनाव, ऊर्जा स्तर को बढ़ाने, दर्द कम करने और कैंसर या इसके उपचार के लक्षण कम करने में भी मदद कर सकती है। दर्द – कुछ प्राथमिक प्रमाण यह बताते है कि एक्यूप्रेशर थेरेपी कमर दर्द, आपरेशन के बाद होने वाले दर्द और सिरदर्द में मदद कर सकती है। इससे अन्य तरह के दर्द में भी लाभ हो सकता है। गठिया – कुछ अध्ययनों के अनुसार एक्यूप्रेशर थेरेपी से हमारे शरीर में एंडोर्फिन्स रिलीज़ होते हैं और यह थेरेपी एंटी-सूजन असर को बढ़ावा देती है, जिससे कुछ प्रकार के गठिया रोगों में मदद मिलती हैं। अवसाद और चिंता – कुछ अध्ययन बताते है कि एक्यूप्रेशर थेरेपी से थकान और मनोदशा में सुधार हो सकता है।
एक्यूप्रेशर के नुकसान –
किसी भी अन्य उपचार की ही तरह एक्यूप्रेशर थेरेपी के भी कुछ साइड इफेक्ट हो सकते हैं, जैसे कि –
गलत बिंदुओं पर दबाव डालने से परेशानी में कोई लाभ नहीं होता है और कभी-कभी इससे कोई दूसरी परेशानी भी हो सकती है। बहुत अधिक या बहुत कम दबाव से कोई मदद नहीं मिलती है। वास्तव में बहुत अधिक दबाव से शरीर के उस अंग में फ्रैक्चर हो सकता है। गर्भावस्था में एक्यूप्रेशर थेरेपी करवाने से मिसकैरेज हो सकता है और अगर गलत बिंदु पर दबाव डाला जाता है तो माँ और बच्चे दोनों को खतरा हो सकता है\। कुछ बीमारियों को थोड़े समय के लिए ठीक किया जा सकता है किन्तु वें दुबारा हो सकती हैं। अगर बीमारी बहुत पुरानी है तो एक्यूप्रेशर थेरेपी से फायदे की जगह नुकसान हो सकता है और बीमारी और भी गंभीर हो सकती है। सामान्य रूप से एक्यूप्रेशर बहुत सुरक्षित उपचार है। अगर आपको कैंसर, दिल की बीमारी, जीर्ण रोग (पुरानी बीमारी) हैं, तो कोई भी थेरेपी करवाने से पहले अपने डॉक्टर से परामर्श करें। एक रजिस्टर्ड एक्यूप्रेशर थेरेपिस्ट से ही थेरेपी करवाएं।
अगर आप हैं एक्यूप्रेशर को सीखना चाहते हैं या एक्यूप्रेशर से अपना इलाज कराना चाहते हैं। तो संपर्क करें…. – Jatin Tyagi (+91-8168961018 Whatsapp Only)
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मानव शरीर के लिए पानी का बहुत अधिक महत्व है, यह निम्न कार्य करने मे सहायक होता है।
1. पानी पीने से हमारे शरीर में रक्त संचार अच्छा होता है। पानी पीने से हमारे शरीर की गंदगी मल मूत्र पसीने के रूप में बाहर आती है जिससे हम बहुत सी बीमारियों से बच सकते हैं।
2. पानी पीने से हमारी त्वचा निखरती है बाल मुलायम, चमकदार होते हैं।
3. खाना खाने से पचता है जिससे की वह पतला होकर शरीर के हर भाग तक पहुंच पाता है।
4. पानी पीने से हमारे शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है और शरीर ज्यादा गर्मी महसूस करने पर पसीने के रूप में बाहर निकालती है जिससे कि हम अनेकों बीमारियों से हमारा बचाव होता है।
शरीर मैं पानी पहुंचता कैसे हैं :
शरीर में पानी मुख्यतः दो स्त्रोतों से पहुंचता है, एक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष , प्रत्यक्ष रूप वो जिसमें हम सीधे रूप से पानी का सेवन करते हैं और अप्रत्यक्ष रूप में वो सब आता है, जो भी हम खाते हैं (चाहे वह दूध, फल, माँस या क्या कहूं तो हर खाने वाली चीज में कुछ-कुछ मात्रा में पानी मौजूद होता है। इस तरह से हमारे शरीर में पानी पहुंचता है।
शरीर से पानी निकलता कैसे है :
हमारे शरीर से पानी विभिन्न रूपों से निकलता है, मुख्यतः शरीर से पानी निकलने का मात्र साधन मल, मूत्र और पसीना होता है।
कैसे पहचाने कि शरीर में पानी की कमी हो रही है ?
शरीर में पानी की कमी होने के मुख्य का कुछ लक्षण हमें दिखते हैं , जैसे पेट में जलन होना , सिर दर्द रहना, कब्ज होना, जल्दी थक जाना, मांसपेशियों में खिंचाव, चिड़चिड़ापन, शरीर का रूखापन, चेहरे से ओज कम होना और ऐसे बहुत से लक्षण हमें देखने को मिलते हैं।
शरीर में पानी पीने के फायदे, :
शरीर में जैसा कि हम जानते हैं कि हमारा शरीर में 72-78% पानी होता है। हमारे शरीर के अंग भी पानी से बने होते हैं तो इसलिए हमें पानी ज्यादा से ज्यादा ही पीना चाहिए, बाकी का मैं फ़ोटो और वीडियो के रूप में आप को समझाना चाहूंगा पानी का हमारे शरीर में फायदा क्या है।
क्या ज्यादा पानी पीने से नुकसान होता है ?
इसका जवाब मैं यह कहूंगा जिस तरह आति से बढ़कर जो भी काम करते हैं उसका नुकसान होता है, ठीक उसी तरह जयादा पानी पीने से भी हमारे शरीर में नुकसान होता है।
My Tip for Everyone: समान्यतः अगर आप हर 20 मिनट में 250ml पानी पीते हैं, या कहे तो 2.8-3.5 लीटर पूरे दिन में अगर आप पानी पीते हैं तो इससे आपके शरीर में कभी भी पानी कमी नहीं होगी। पर जैसा कि अब गर्मी आ रही है तो अगर आप हो सके तो शिकंजी या नारियल का पानी पिएंगे तो इससे आप शरीर पानी की पूर्ति ज्यादा होगी।
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जो पूरी गीता नही पढ़ सकते उन सभी के लिए “गीता का सार”
• क्यों व्यर्थ की चिंता करते हो? किससे व्यर्थ डरते हो? कौन तुम्हें मार सकता है? आत्मा ना पैदा होती है, न मरती है।
• जो हुआ, वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है, जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा। तुम भूत का पश्चाताप न करो। भविष्य की चिन्ता न करो। वर्तमान चल रहा है।
• तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो? तुम क्या लाए थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया? न तुम कुछ लेकर आए, जो लिया यहीं से लिया। जो दिया, यहीं पर दिया। जो लिया, इसी (भगवान) से लिया। जो दिया, इसी को दिया।
• खाली हाथ आए और खाली हाथ चले। जो आज तुम्हारा है, कल और किसी का था, परसों किसी और का होगा। तुम इसे अपना समझ कर मग्न हो रहे हो। बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दु:खों का कारण है।
• परिवर्तन संसार का नियम है। जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन है। एक क्षण में तुम करोड़ों के स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही क्षण में तुम दरिद्र हो जाते हो। मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया, मन से मिटा दो, फिर सब तुम्हारा है, तुम सबके हो।
• न यह शरीर तुम्हारा है, न तुम शरीर के हो। यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बना है और इसी में मिल जायेगा। परन्तु आत्मा स्थिर है – फिर तुम क्या हो?
• तुम अपने आपको भगवान को अर्पित करो। यही सबसे उत्तम सहारा है। जो इसके सहारे को जानता है वह भय, चिन्ता, शोक से सर्वदा मुक्त है।
• जो कुछ भी तू करता है, उसे भगवान को अर्पण करता चल। ऐसा करने से सदा जीवन-मुक्त का आनंन्द अनुभव करेगा।
जिस किसी को संक्षिप्त में भगवत गीता का अध्यन करना है वो facebook page “@JatinTyagi-Motivation” जाकर पढ़ सकता है नीचे उसका link डाला है देखे और अच्छा लगे तो share करिएगा।https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=116232780086999&id=112964333747177
Jatin Tyagi (born 11th April) is a former Indian footballer. He played as a Defender, Coach, Educator, Motivator, Animal Activist, Program Coordinator atFit India Movementrun byGovernment of India , Founder ofP.F.A INDIA & Director ofPankration Fitness Academy Private Limited.
Jatin Tyagi in 2018 at Aiff House, New Delhi
Early Life and Playing Career:
Jatin was born into a Tyagi Brhaman Family on 11th April at Yamunanagar City, Haryana. He started playing football from streets of Yamunanagar. He had passion for the game of football, and somehow caught the eye then he started playing in Tejli Stadium, he rejected from his school team and then he work hard and select in Haryana States team and then he never look back.
Playing Career:
* Represent India in Russia. * Represent India in Dubai. * Represent Indian National Team in Thailand. * Represent Indian National Team in Poland. * Represent Delhi in Senior National tournament (Santosh Trophy) at Rajasthan. * Represent Chandigarh in Senior National tournament (Santosh Trophy) at J&K. * Represent Haryana in Senior National tournament (Santosh Trophy) at Uttarakhand. * Played AlI India University Tournament from M.D.U Rohtak in Kerala. * Played Inter University Tournament from M.D.U Rohtak in Punjab. Represent India in Junior age category. * Represent Haryana U-19 age category at Assam. * Participated in SGFI U-17 age category at Nadia, West Bengal. * Represent Haryana in U-14 age category at Satna, MP.
Education:
M.D. in Acupressure Therapy|Sports Psychology| Master in Sports Coaching| Diploma in sports Coaching|PGD in Sports Management | Bachelor of Technology| First Aid – Lecturer| Nutritionist| Fitness Trainer.
* All India Football Federation – Professional Football Coaching License. * All India Football Federation – Grassroots Leaders * All India Football Federation – Referee
Coaching Carrer:
* All India Football Federation – COACH * Worked as a Santosh Trophy Selector with Football Delhi. * Worked as a Santosh Trophy Selector with Chandigarh Football Association. * Worked with Senior Boys College Team Represent M.D.U at Punjab Desh BhagatUniversity. * Worked with Senior Girls College Team Represent KUK University at Chitkara University.-
* Worked with U-18 I -League team Shivananad FC. * Worked with U-15 I-League team Shivananad FC. * Worked with U-13 I-League team Minerva Punjab FC. * Worked with U-14 Boys Team Represent India at Nepal. * Worked with U-17 Boys Team National at Goa. * Worked with U-14 Girls Team Represent Haryana at Himachal Pardesh.
SKILLS:
Language – English, Hindi, Marathi, Guajarati, Punjabi, Bengali, Spanish. Designing – Soccer Sketch, Soccer Coach, Tactics Manager 3.0 Computer Well versed with MS office, Window7/8.
In a bid to improve football, professionalise the set-up and to reach out to every stakeholder in the National Capital Region (NCR), Football Delhi has implemented the Academy Accreditation and Licensing System.
In a bid to improve football, professionalise the set-up and to reach out to every stakeholder in the National Capital Region (NCR), Football Delhi has implemented the Academy Accreditation and Licensing System
This is an effort to ensure that every small football academy in the city, including schools and NGO-operated football training centres in the NCR, benefits as Football Delhi tries to spread the sport
The system will be operational from 23 November and all the details will be available online on the official website of FA
My Source: In a bid to improve football, professionalise the set-up and to reach out to every stakeholder in the National Capital Region (NCR), Football Delhi has implemented the Academy Accreditation and Licensing System.
Delhi is the first state association to do so.
This is an effort to ensure that every small football academy in the city, including schools and NGO-operated football training centres in the NCR, benefits as Football Delhi tries to spread the sport.
The system will be operational from 23 November and all the details will be available online on the official website of FA.
Objective and transparent criteria are being devised to grant licenses to academies and make them a valuable part of the football structure in Delhi.
A strict licensing system will be employed so that standards are met and a standardised and professional set-up is created with a bottom-up approach. While the academies will be eligible to fill in forms online and apply for accreditation, a physical visit and evaluation by Football Delhi will complete the process.
“With academy accreditation and licensing system, we are making an attempt to make academies an integral part of the football structure in Delhi. With all the details available on the website, academies will reach out to us and our reviewer will evaluate and monitor the academies,” said FA president Shaji Prabhakaran.
“If they meet the standardised protocols, they will be granted immediate accreditation and license. However, if they fail, they will be handheld to reach the desired criteria.”
“The goal is not to segregate but to integrate so that football can spread to every nook and corner and every academy is an equal stakeholder in the developmental process,” Prabhakaran added.
Once it starts, the system will also help parents to take an informed decision for shortlisting an academy for their children as there will be a certain set transparent standard which would be reflected in the academy star ratings.
There will be three categories of licenses or star ratings (1 to 3 star ratings). Star 3 rating means the academies are the best in Delhi and they will have a certain standard in the following areas: coaching staff, facility, medical and safety, child protection policy, calendar of activities, programme, gender equality, and also link with registered football clubs of Delhi.
Thank you for reading, stay tuned with me. Keep supporting friends below given links.
प्रस्तावना : भारतीय वसुंधरा को गौरवान्वित करने वाली झांसी की रानी वीरांगना लक्ष्मीबाई वास्तविक अर्थ में आदर्श वीरांगना थीं। सच्चा वीर कभी आपत्तियों से नहीं घबराता है। प्रलोभन उसे कर्तव्य पालन से विमुख नहीं कर सकते। उसका लक्ष्य उदार और उच्च होता है। उसका चरित्र अनुकरणीय होता है। अपने पवित्र उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वह सदैव आत्मविश्वासी, कर्तव्य परायण, स्वाभिमानी और धर्मनिष्ठ होता है। ऐसी ही थीं वीरांगना लक्ष्मीबाई।
The Queen Of Jhansi (19th November,1835-18thJune, 1858)
परिचय : महारानी लक्ष्मीबाई का जन्म काशी में 19 नवंबर 1835 को हुआ। इनके पिता मोरोपंत ताम्बे चिकनाजी अप्पा के आश्रित थे। इनकी माता का नाम भागीरथी बाई था। महारानी के पितामह बलवंत राव के बाजीराव पेशवा की सेना में सेनानायक होने के कारण मोरोपंत पर भी पेशवा की कृपा रहने लगी। लक्ष्मीबाई अपने बाल्यकाल में मनुबाई के नाम से जानी जाती थीं।
विवाह : इधर सन् 1838 में गंगाधर राव को झांसी का राजा घोषित किया गया। वे विधुर थे। सन् 1850 में मनुबाई से उनका विवाह हुआ। सन् 1851 में उनको पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। झांसी के कोने-कोने में आनंद की लहर प्रवाहित हुई, लेकिन चार माह पश्चात उस बालक का निधन हो गया।
सारी झांसी शोक सागर में निमग्न हो गई। राजा गंगाधर राव को तो इतना गहरा धक्का पहुंचा कि वे फिर स्वस्थ न हो सके और 21 नवंबर 1853 को चल बसे। यद्यपि महाराजा का निधन महारानी के लिए असहनीय था, लेकिन फिर भी वे घबराई नहीं, उन्होंने विवेक नहीं खोया। राजा गंगाधर राव ने अपने जीवनकाल में ही अपने परिवार के बालक दामोदर राव को दत्तक पुत्र मानकर अंगरेजी सरकार को सूचना दे दी थी। परंतु ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार ने दत्तक पुत्र को अस्वीकार कर दिया।
संघर्ष : 27 फरवरी 1854 को लार्ड डलहौजी ने गोद की नीति के अंतर्गत दत्तकपुत्र दामोदर राव की गोद अस्वीकृत कर दी और झांसी को अंगरेजी राज्य में मिलाने की घोषणा कर दी। पोलेटिकल एजेंट की सूचना पाते ही रानी के मुख से यह वाक्य प्रस्फुटित हो गया, ‘मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी’। 7 मार्च 1854 को झांसी पर अंगरेजों का अधिकार हुआ। झांसी की रानी ने पेंशन अस्वीकृत कर दी व नगर के राजमहल में निवास करने लगीं। यहीं से भारत की प्रथम स्वाधीनता क्रांति का बीज प्रस्फुटित हुआ। अंगरेजों की राज्य लिप्सा की नीति से उत्तरी भारत के नवाब और राजे-महाराजे असंतुष्ट हो गए और सभी में विद्रोह की आग भभक उठी। रानी लक्ष्मीबाई ने इसको स्वर्णावसर माना और क्रांति की ज्वालाओं को अधिक सुलगाया तथा अंगरेजों के विरुद्ध विद्रोह करने की योजना बनाई। नवाब वाजिद अली शाह की बेगम हजरत महल, अंतिम मुगल सम्राट की बेगम जीनत महल, स्वयं मुगल सम्राट बहादुर शाह, नाना साहब के वकील अजीमुल्ला शाहगढ़ के राजा, वानपुर के राजा मर्दनसिंह और तात्या टोपे आदि सभी महारानी के इस कार्य में सहयोग देने का प्रयत्न करने लगे।
विद्रोह : भारत की जनता में विद्रोह की ज्वाला भभक गई। समस्त देश में सुसंगठित और सुदृढ रूप से क्रांति को कार्यान्वित करने की तिथि 31 मई 1857 निश्चित की गई, लेकिन इससे पूर्व ही क्रांति की ज्वाला प्रज्ज्वलित हो गई और 7 मई 1857 को मेरठ में तथा 4 जून 1857 को कानपुर में, भीषण विप्लव हो गए। कानपुर तो 28 जून 1857 को पूर्ण स्वतंत्र हो गया। अंगरेजों के कमांडर सर ह्यूरोज ने अपनी सेना को सुसंगठित कर विद्रोह दबाने का प्रयत्न किया। उन्होंने सागर, गढ़कोटा, शाहगढ़, मदनपुर, मडखेड़ा, वानपुर और तालबेहट पर अधिकार कियाऔर नृशंसतापूर्ण अत्याचार किए। फिर झांसी की ओर अपना कदम बढ़ाया और अपना मोर्चा कैमासन पहाड़ी के मैदान में पूर्व और दक्षिण के मध्य लगा लिया। लक्ष्मीबाई पहले से ही सतर्क थीं और वानपुर के राजा मर्दनसिंह से भी इस युद्ध की सूचना तथा उनके आगमन की सूचना प्राप्त हो चुकी थी। 23 मार्च 1858 को झांसी का ऐतिहासिक युद्ध आरंभ हुआ। कुशल तोपची गुलाम गौस खां ने झांसी की रानी के आदेशानुसार तोपों के लक्ष्य साधकर ऐसे गोले फेंके कि पहली बार में ही अंगरेजी सेना के छक्के छूट गए। रानी लक्ष्मीबाई ने सात दिन तक वीरतापूर्वक झांसी की सुरक्षा की और अपनी छोटी-सी सशस्त्र सेना से अंगरेजों का बड़ी बहादुरी से मुकाबला किया। रानी ने खुलेरूप से शत्रु का सामना किया और युद्ध में अपनी वीरता का परिचय दिया। वे अकेले ही अपनी पीठ के पीछे दामोदर राव को कसकर घोड़े पर सवार हो, अंगरेजों से युद्ध करती रहीं। बहुत दिन तक युद्ध का क्रम इस प्रकार चलना असंभव था। सरदारों का आग्रह मानकर रानी ने कालपी प्रस्थान किया। वहां जाकर वे शांत नहीं बैठीं। उन्होंने नाना साहब और उनके योग्य सेनापति तात्या टोपे से संपर्क स्थापित किया और विचार-विमर्श किया। रानी की वीरता और साहस का लोहा अंगरेज मान गए, लेकिन उन्होंने रानी का पीछा किया। रानी का घोड़ा बुरी तरह घायल हो गया और अंत में वीरगति को प्राप्त हुआ, लेकिन रानी ने साहस नहीं छोड़ा और शौर्य का प्रदर्शन किया। कालपी में महारानी और तात्या टोपे ने योजना बनाई और अंत में नाना साहब, शाहगढ़ के राजा, वानपुर के राजा मर्दनसिंह आदि सभी ने रानी का साथ दिया। रानी ने ग्वालियर पर आक्रमण किया और वहां के किले पर अधिकार कर लिया। विजयोल्लास का उत्सव कई दिनों तक चलता रहा लेकिन रानी इसके विरुद्ध थीं। यह समय विजय का नहीं था, अपनी शक्ति को सुसंगठित कर अगला कदम बढ़ाने का था।
उपसंहार : सेनापति सर ह्यूरोज अपनी सेना के साथ संपूर्ण शक्ति से रानी का पीछा करता रहा और आखिरकार वह दिन भी आ गया जब उसने ग्वालियर का किला घमासान युद्ध करके अपने कब्जे में ले लिया।
रानी लक्ष्मीबाई इस युद्ध में भी अपनी कुशलता का परिचय देती रहीं। 18 जून 1858 को ग्वालियर का अंतिम युद्ध हुआ और रानी ने अपनी सेना का कुशल नेतृत्व किया। वे घायल हो गईं और अंततः उन्होंने वीरगति प्राप्त की।
रानी लक्ष्मीबाई ने स्वातंत्र्य युद्ध में अपने जीवन की अंतिम आहूति देकर जनता जनार्दन को चेतना प्रदान की और स्वतंत्रता के लिए बलिदान का संदेश दिया।
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आप सोच रहे होंगे की ये सेंधा नमक बनता कैसे है ?? आइये आज हम आपको बताते है कि नमक मुख्यत: कितने प्रकार का होता है। एक होता है समुद्री नमक, दूसरा होता है सेंधा नमक (rock salt) । सेंधा नमक बनता नहीं है पहले से ही बना बनाया है। पूरे उत्तर भारतीय उपमहाद्वीप में खनिज पत्थर के नमक को ‘सेंधा नमक’ या ‘सैन्धव नमक’, लाहोरी नमक आदि आदि नाम से जाना जाता है । जिसका मतलब है ‘सिंध या सिन्धु के इलाक़े से आया हुआ’। वहाँ नमक के बड़े बड़े पहाड़ है सुरंगे है । वहाँ से ये नमक आता है। मोटे मोटे टुकड़ो मे होता है आजकल पीसा हुआ भी आने लगा है यह ह्रदय के लिये उत्तम, दीपन और पाचन मे मदद रूप, त्रिदोष शामक, शीतवीर्य अर्थात ठंडी तासीर वाला, पचने मे हल्का है । इससे पाचक रस बढ़ते हैं। अतः: आप ये समुद्री नमक के चक्कर से बाहर निकले। काला नमक ,सेंधा नमक प्रयोग करे, क्यूंकि ये प्रकृति का बनाया है ।
ये कोई पत्थर नहीं सेंधा नमक है
भारत मे 1930 से पहले कोई भी समुद्री नमक नहीं खाता था विदेशी कंपनीयां भारत में नमक के व्यापार मे आज़ादी के पहले से उतरी हुई है , उनके कहने पर ही भारत के अँग्रेजी प्रशासन द्वारा भारत की भोली भाली जनता को आयोडिन मिलाकर समुद्री नमक खिलाया जा रहा है, हुआ ये कि जब ग्लोबलाईसेशन के बाद बहुत सी विदेशी कंपनियों (अन्नपूर्णा,कैप्टन कुक ) ने नमक बेचना शुरू किया तब ये सारा खेल शुरू हुआ ! अब समझिए खेल क्या था ?? खेल ये था कि विदेशी कंपनियो को नमक बेचना है और बहुत मोटा लाभ कमाना है और लूट मचानी है तो पूरे भारत में एक नई बात फैलाई गई कि आयोडीन युक्त नामक खाओ , आयोडीन युक्त नमक खाओ ! आप सबको आयोडीन की कमी हो गई है। ये सेहत के लिए बहुत अच्छा है आदि आदि बातें पूरे देश में प्रायोजित ढंग से फैलाई गई । और जो नमक किसी जमाने में 2 से 3 रूपये किलो में बिकता था । उसकी जगह आयोडीन नमक के नाम पर सीधा भाव पहुँच गया 8 रूपये प्रति किलो और आज तो 20 रूपये को भी पार कर गया है।
दुनिया के 56 देशों ने अतिरिक्त आयोडीन युक्त नमक 40 साल पहले बैन कर दिया अमेरिका में नहीं है जर्मनी मे नहीं है फ्रांस में नहीं ,डेन्मार्क में नहीं , डेन्मार्क की सरकार ने 1956 में आयोडीन युक्त नमक बैन कर दिया क्यों ?? उनकी सरकार ने कहा हमने आयोडीन युक्त नमक खिलाया !(1940 से 1956 तक ) अधिकांश लोग नपुंसक हो गए ! जनसंख्या इतनी कम हो गई कि देश के खत्म होने का खतरा हो गया ! उनके वैज्ञानिकों ने कहा कि आयोडीन युक्त नमक बंद करवाओ तो उन्होने बैन लगाया। और शुरू के दिनों में जब हमारे देश में ये आयोडीन का खेल शुरू हुआ इस देश के बेशर्म नेताओं ने कानून बना दिया कि बिना आयोडीन युक्त नमक भारत में बिक नहीं सकता । वो कुछ समय पूर्व किसी ने कोर्ट में मुकदमा दाखिल किया और ये बैन हटाया गया।
आज से कुछ वर्ष पहले कोई भी समुद्री नमक नहीं खाता था सब सेंधा नमक ही खाते थे ।
सेंधा नमक के फ़ायदे:-
सेंधा नमक के उपयोग से रक्तचाप और बहुत ही गंभीर बीमारियों पर नियन्त्रण रहता है । क्योंकि ये अम्लीय नहीं ये क्षारीय है (alkaline) क्षारीय चीज जब अमल मे मिलती है तो वो न्यूटल हो जाता है और रक्त अमलता खत्म होते ही शरीर के 48 रोग ठीक हो जाते हैं ।
ये नमक शरीर मे पूरी तरह से घुलनशील है । और सेंधा नमक की शुद्धता के कारण आप एक और बात से पहचान सकते हैं कि उपवास ,व्रत में सब सेंधा नमक ही खाते है। तो आप सोचिए जो समुद्री नमक आपके उपवास को अपवित्र कर सकता है वो आपके शरीर के लिए कैसे लाभकारी हो सकता है ??
सेंधा नमक शरीर में 97 पोषक तत्वों की कमी को पूरा करता है ! इन पोषक तत्वों की कमी ना पूरी होने के कारण ही लकवे (paralysis) का अटैक आने का सबसे बडा जोखिम होता है सेंधा नमक के बारे में आयुर्वेद में बोला गया है कि यह आपको इसलिये खाना चाहिए क्योंकि सेंधा नमक वात, पित्त और कफ को दूर करता है।
यह पाचन में सहायक होता है और साथ ही इसमें पोटैशियम और मैग्नीशियम पाया जाता है जो हृदय के लिए लाभकारी होता है। यही नहीं आयुर्वेदिक औषधियों में जैसे लवण भास्कर, पाचन चूर्ण आदि में भी प्रयोग किया जाता है।
समुद्री नमक के भयंकर नुकसान :-
ये जो समुद्री नमक है आयुर्वेद के अनुसार ये तो अपने आप में ही बहुत खतरनाक है ! क्योंकि कंपनियाँ इसमें अतिरिक्त आयोडीन डाल रही है। अब आयोडीन भी दो तरह का होता है एक तो भगवान का बनाया हुआ जो पहले से नमक में होता है । दूसरा होता है “industrial iodine” ये बहुत ही खतरनाक है। तो समुद्री नमक जो पहले से ही खतरनाक है उसमे कंपनिया अतिरिक्त industrial iodine डाल को पूरे देश को बेच रही है। जिससे बहुत सी गंभीर बीमरियां हम लोगों को आ रही है । ये नमक मानव द्वारा फ़ैक्टरियों में निर्मित है।
आम तौर से उपयोग मे लाये जाने वाले समुद्री नमक से उच्च रक्तचाप (high BP ) ,डाइबिटीज़, आदि गंभीर बीमारियो का भी कारण बनता है । इसका एक कारण ये है कि ये नमक अम्लीय (acidic) होता है । जिससे रक्त अम्लता बढ़ती है और रक्त अमलता बढ्ने से ये सब 48 रोग आते है । ये नमक पानी कभी पूरी तरह नहीं घुलता हीरे (diamond ) की तरह चमकता रहता है इसी प्रकार शरीर के अंदर जाकर भी नहीं घुलता और अंत इसी प्रकार किडनी से भी नहीं निकल पाता और पथरी का भी कारण बनता है । रिफाइण्ड नमक में 98% सोडियम क्लोराइड ही है शरीर इसे विजातीय पदार्थ के रुप में रखता है। यह शरीर में घुलता नही है। इस नमक में आयोडीन को बनाये रखने के लिए Tricalcium Phosphate, Magnesium Carbonate, Sodium Alumino Silicate जैसे रसायन मिलाये जाते हैं जो सीमेंट बनाने में भी इस्तेमाल होते है। विज्ञान के अनुसार यह रसायन शरीर में रक्त वाहिनियों को कड़ा बनाते हैं, जिससे ब्लाक्स बनने की संभावना और आक्सीजन जाने में परेशानी होती है। जोड़ो का दर्द और गठिया, प्रोस्टेट आदि होती है। आयोडीन नमक से पानी की जरुरत ज्यादा होती है। 1 ग्राम नमक अपने से 23 गुना अधिक पानी खींचता है। यह पानी कोशिकाओं के पानी को कम करता है। इसी कारण हमें प्यास ज्यादा लगती है।
आप इस अतिरिक्त आयोडीन युक्त समुद्री नमक खाना छोड़िए और उसकी जगह सेंधा नमक खाइये !! सिर्फ आयोडीन के चक्कर में समुद्री नमक खाना समझदारी नहीं है, क्योंकि जैसा हमने ऊपर बताया आयोडीन हर नमक में होता है सेंधा नमक में भी आयोडीन होता है बस फर्क इतना है इस सेंधा नमक में प्रकृति के द्वारा बनाया आयोडीन होता है इसके इलावा आयोडीन हमें आलू, अरवी के साथ-साथ हरी सब्जियों से भी मिल जाता है।
The International Football Association Board (IFAB) is the body that determines the Laws of the Game of associaction football. IFAB was founded in 1886 to agree standardised Laws for international competition, and has since acted as the “guardian” of the internationally used Laws. Since its establishment in 1904, FIFA, the sport’s top governing body, has recognised IFAB’s jurisdiction over the Laws. IFAB is known to take a highly conservative attitude regarding changes to the Laws of the Game.
IFABFormation1886; 134 years ago Purpose Management of the Laws of the game Headquarters Zurich, Switzerland Region served Worldwide Membership
It is a separate body from FIFA, though FIFA is represented on the board and holds 50% of the voting power. As a legacy of association football’s origins in the UnitedKingdom, the other organisations represented are the governing bodies of the game in the four countries of the UK. Amendments to the Laws require a three-quarter supermajority vote, meaning that FIFA’s support is necessary but not sufficient for a motion to pass.
Law’s of the Game:
There are 17 laws in football:-
Laws of the Game
IFAB currently acknowledges 17 laws of soccer that are the standard for any professional or international match played. They are as follows:
Law 1: The Field of Play
Soccer can be played on either grass or artificial turf, but the surface must be green in color. The field must be rectangular in shape, and distinctly marked by two short goal lines and two long-touch lines. The field is divided into halves, separated by the halfway line, which runs from the midpoints of each touchline. At the midpoint of the halfway line is a marked center point surrounded by a lined center circle with a radius of 10 yards. Opposing players are not allowed to enter this circle during the possessing team’s kick-off. The length of the touch line must be greater than the length of the goal line.Regulation lengths are:
Width (goal line): Minimum 45 m (50 yds), maximum 90 m (100 yds).
At each end of the field is an eight-yard-wide goal centered along the goal line.
Six yards from each goal post along the goal line and six yards out into the field (perpendicular to the goal line) is the goal box.
Extending 18 yards from each goal post along the goal line and 18 yards out into the field (perpendicular to the goal line) is the penalty box.
In each of the four corners of the field is a five-foot-high corner flag.
Law 2: The Ball
A soccer ball must be spherical in shape and made of leather or another comparable medium. Its circumference must be in the range of 27 to 28 inches. This rule is only applicable for official sanctioned matches, as youth leagues often employ the use of a smaller ball that is better suited to children.
Law 3: The Number of Players
Matches are generally played by two teams of 11 to a side. The goalkeeper is included in the 11-player total. If a team cannot field at least seven players at match time, the game is a forfeit. Teams of fewer than 11 a side can often be seen in youth leagues where smaller teams are used as a developmental tool. FIFA-sanctioned matches are generally limited to three substitutions per match, with the exception of friendly matches. Most youth leagues allow an unlimited number of substitutions, which must also be listed on the game card prior to the beginning of the match, otherwise those players are ineligible. Substitutions may only enter at the halfway line, upon the referee’s approval, and after the player being subbed out has left the pitch. The goalkeeper may be substituted with anyone on the pitch or any eligible substitute on the bench during a game stoppage.
Law 4: The Players’ Equipment
All players are required to wear a jersey, shorts, shin guards, socks and cleats. The socks must cover the shin guards entirely. If the referee deems a player’s equipment unsatisfactory, the player can be sent off until the issue is remedied.
Law 5: The Referee
The referee is the authority on the field, and his word is law. If you question a referee’s decision, you can be disciplined further simply for dissent.
Law 6: The Assistant Referees
The assistant referees are primarily responsible for assisting the referee in performing his duties – this includes signaling with a flag when a ball goes of play, when a player is fouled, or when a player is in an offside position.
Law 7: The Duration of the Match
A soccer match is comprised of two 45-minute halves, with extra time added for each at the referee’s discretion. The halves are separated by a half-time period not to exceed 15 minutes. The extra time generally corresponds with the referee’s determination of how much time was taken up due to substitutions and injuries. The amount of extra time is announced and displayed at the half line at the end of each 45-minute period. Although soccer does have an allotted time limit, it is ultimately up to the referee’s as to when to end a match.
Law 8: The Start and Restart of Play
Kick-off is generally determined by a coin toss, whereby the winning team can either choose to start with the ball or choose which goal they would like to attack. The losing team is then afforded whatever choice the winner does not elect to take. Kick-off occurs at the start of each half, and after each goal scored, and is taken at the center of the halfway line. If a team scores a goal, the opposing team is given the kick-off to restart the match.
Law 9: The Ball In and Out of Play
The ball is out of play when it fully crosses either the goal line or the touch line. It is also out of play if the referee stops play for any reason. If, for any reason, the ball strikes the frame of the goal or the referee and remains within the goal and touch lines, it is still in play.
Law 10: The Method of Scoring
A goal is scored when the entire ball has crossed the goal line within the frame of the goal. At the end of the match, the team with the most goals is the winner, barring the circumstantial necessity for extra time.
Law 11: Offside
When an attacking player receives the ball while on his opponents half, he must be level or behind the second to last defender (the last typically being the goalkeeper). However, this rule only applies if he is involved with the play. To get a better understanding of the offside rule, please see the guide section for a more detailed explanation.
Law 12: Fouls and Misconduct
A direct free kick is awarded when a player:
Kicks or attempts to kick an opponent
Trips or attempts to trip an opponent
Jumps at an opponent
Charges an opponent
Strikes or attempts to strike an opponent
Pushes an opponent
Tackles an opponent
Holds an opponent
Spits at an opponent
Handles the ball deliberately
If any of these are fouls are committed by a player in their team’s penalty area, the opposing team is awarded a penalty kick. Indirect free kicks are awarded if a player:
Plays in a dangerous manner
Impedes the progress of an opponent
Prevents the goalkeeper from releasing the ball from his/her hands
Commits any other unmentioned offense
Yellow cards are awarded as a caution or warning to a player and can be issued for the following offenses:
Unsporting behavior
Dissent by word or action
Persistent infringement of the Laws of the Game
Delaying the restart of play
Failure to respect the required distance when play is restarted with a corner kick,free kick, or throw-in
Entering or re-entering the field of play without the referee’s permission
deliberately leaving the field of play without the referee’s permission
Red cards are used to send a player off the field, and can be issued for the following offenses:
Serious foul play
Violent conduct
Spitting at an opponent or any other person
Denying the opposing team a goal or an obvious goal-scoring opportunity by deliberately handling the ball (the goalkeeper being an exception)
Denying an obvious goal-scoring opportunity to an opponent moving towards the player’s goal by an offense punishable by a free kick or a penalty kick
Using offensive or abusive language and/or gestures
Receiving a second caution (yellow card) in the same match
Law 13: Free Kicks
Free Kick is broken into two categories, direct and indirect. A direct kick can be shot directly into the opponent’s goal without touching another player. An indirect free kick is indicated by the referee raising his hand during the kick. An indirect kick can only go into the goal if it has subsequently been touched by another player before it enters the goal. The ball must be stationary for both types of kicks.
Law 14: The Penalty Kick
A penalty kick is awarded either when a defensive player fouls an attacking player or commits a handball in his/her team’s penalty area. The penalty kick is placed at the penalty spot, and all players on both teams must remain outside the penalty box during the shot. They may enter the box immediately after the shot is taken. The goalkeeper may move horizontally along the goal line before the shot is taken, but he may not come off the line until the ball is struck.
Law 15: The Throw-In
A throw-in is awarded when the possessing team plays the ball out of bounds over the touchline. While taking a throw-in, a player must release the ball with both hands simultaneously and keep both feet firmly planted on the ground. If these conditions are not met, play is stopped and the throw-in is given to the opposing team. Players are not allowed to score directly off a throw-in.
Law 16: The Goal Kick
A goal kick is awarded when the offensive team plays the ball out of bounds over the defensive team’s goal line. After the ball is out of play, the defender or goalkeeper may place the ball anywhere within the six-yard goal box and kick the ball back into play.
Law 17: The Corner Kick
A corner kick is awarded to the offensive team when the defensive team plays the ball out of bounds over its goal line. The ball is placed within the corner area and is kicked back into play by the offensive team. Players can score directly off a corner kick.
बात बात में मां बाप का टोकना हमें अखरता है । हम भीतर ही भीतर झल्लाते है कि कब इनके टोकने की आदत से हमारा पीछा जुटेगा । लेकिन हम ये भूल जाते है कि उनके टोकने से जो संस्कार हम ग्रहण कर रहे हैं, उनकी जीवन में क्या अहमियत है । इसी पर एक लेख किसी भाई ने भेजा है, जिसे मैं आगे शेयर करने से अपने आप को रोक नहीं पाया ।
साक्षात्कार
बड़ी दौड़ धूप के बाद , मैं आज एक ऑफिस में पहुंचा, आज मेरा पहला इंटरव्यू था , घर से निकलते हुए मैं सोच रहा था, काश ! इंटरव्यू में आज कामयाब हो गया , तो अपने पुश्तैनी मकान को अलविदा कहकर यहीं शहर में सेटल हो जाऊंगा, मम्मी पापा की रोज़ की चिक चिक, मग़जमारी से छुटकारा मिल जायेगा ।
सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक होने वाली चिक चिक से परेशान हो गया हूँ ।
जब सो कर उठो , तो पहले बिस्तर ठीक करो , फिर बाथरूम जाओ, बाथरूम से निकलो तो फरमान जारी होता है नल बंद कर दिया? तौलिया सही जगह रखा या यूँ ही फेंक दिया? नाश्ता करके घर से निकलो तो डांट पडती है पंखा बंद किया या चल रहा है? क्या – क्या सुनें यार , नौकरी मिले तो घर छोड़ दूंगा..
वहाँ उस ऑफिस में बहुत सारे उम्मीदवार बैठे थे , बॉस का इंतज़ार कर रहे थे । दस बज गए ।
मैने देखा वहाँ आफिस में बरामदे की बत्ती अभी तक जल रही है , माँ याद आ गई , तो मैने बत्ती बुझा दी ।
ऑफिस में रखे वाटर कूलर से पानी टपक रहा था , पापा की डांट याद आ गयी , तो पानी बन्द कर दिया ।
बोर्ड पर लिखा था , इंटरव्यू दूसरी मंज़िल पर होगा ।
सीढ़ी की लाइट भी जल रही थी , बंद करके आगे बढ़ा , तो एक कुर्सी रास्ते में थी , उसे हटाकर ऊपर गया ।
🌷देखा पहले से मौजूद उम्मीदवार जाते और फ़ौरन बाहर आते , पता किया तो मालूम हुआ बॉस फाइल लेकर कुछ पूछते नहीं , वापस भेज देते हैं ।🌷
नंबर आने पर मैने फाइल मैनेजर की तरफ बढ़ा दी । कागज़ात पर नज़र दौडाने के बाद उन्होंने कहा “कब ज्वाइन कर रहे हो?”
उनके सवाल से मुझे यूँ लगा जैसे मज़ाक़ हो , वो मेरा चेहरा देखकर कहने लगे , ये मज़ाक़ नहीं हक़ीक़त है ।
आज के इंटरव्यू में किसी से कुछ पूछा ही नहीं , सिर्फ CCTV में सबका बर्ताव देखा , सब आये लेकिन किसी ने नल या लाइट बंद नहीं किया ।
धन्य हैं तुम्हारे माँ बाप , जिन्होंने तुम्हारी इतनी अच्छी परवरिश की और अच्छे संस्कार दिए ।
जिस इंसान के पास Self discipline नहीं वो चाहे कितना भी होशियार और चालाक हो , मैनेजमेंट और ज़िन्दगी की दौड़ धूप में कामयाब नहीं हो सकता ।
घर पहुंचकर मम्मी पापा को गले लगाया और उनसे माफ़ी मांगकर उनका शुक्रिया अदा किया ।
अपनी ज़िन्दगी की आजमाइश में उनकी छोटी छोटी बातों पर रोकने और टोकने से , मुझे जो सबक़ हासिल हुआ , उसके मुक़ाबले , मेरे डिग्री की कोई हैसियत नहीं थी और पता चला ज़िन्दगी के मुक़ाबले में सिर्फ पढ़ाई लिखाई ही नहीं , तहज़ीब और संस्कार का भी अपना मक़ाम है…
संसार में जीने के लिए संस्कार जरूरी है ।
संस्कार के लिए मां बाप का सम्मान जरूरी है । 🙏💕🌹😘
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योग के विभूतिपाद में अष्टसिद्धि के अलावा अन्य अनेक प्रकार की सिद्धियों का वर्णन मिलता है। सभी सिद्धियों को प्राप्त करने के लिए चक्रों को जाग्रत करना चाहिए। मनुष्य शरीर स्थित कुंडलिनी शक्ति में जो चक्र स्थित होते हैं उनकी संख्या कहीं छ: तो कहीं सात बताई गई है।
समय-समय पर चक्रों वाले स्थान पर ध्यान दिया जाए तो मानसिक स्वास्थ्य और सुदृढ़ता के साथ ही सिद्धियां प्राप्त की जा सकती हैं तो जानते है चक्रों को जाग्रत करने की विधि और किस चक्र से प्राप्त होती है कौन सी सिद्धि… अगले पन्ने पर… मूलाधार को कैसे करें जाग्रत…
मूलाधार चक्र : यह शरीर का पहला चक्र है। गुदा और लिंग के बीच चार पंखुरियों वाला यह ‘आधार चक्र’ है। 99.9 लोगों की चेतना इसी चक्र पर अटकी रहती है और वे इसी चक्र में रहकर मर जाते हैं। जिनके जीवन में भोग, संभोग और निद्रा की प्रधानता है उनकी ऊर्जा इसी चक्र के आसपास एकत्रित रहती है।
मंत्र : लं
चक्र जगाने की विधि : मनुष्य तब तक पशुवत है, जब तक कि वह इस चक्र में जी रहा है इसीलिए भोग, निद्रा और संभोग पर संयम रखते हुए इस चक्र पर लगातार ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। इसको जाग्रत करने का दूसरा नियम है यम और नियम का पालन करते हुए साक्षी भाव में रहना।
प्रभाव : इस चक्र के जाग्रत होने पर व्यक्ति के भीतर वीरता, निर्भीकता और आनंद का भाव जाग्रत हो जाता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए वीरता, निर्भीकता और जागरूकता का होना जरूरी है। अगले पन्ने पर कैसे जाग्रत करें…स्वाधिष्ठान चक्र…
स्वाधिष्ठान चक्र- यह वह चक्र है, जो लिंग मूल से चार अंगुल ऊपर स्थित है जिसकी छ: पंखुरियां हैं। अगर आपकी ऊर्जा इस चक्र पर ही एकत्रित है तो आपके जीवन में आमोद-प्रमोद, मनोरंजन, घूमना-फिरना और मौज-मस्ती करने की प्रधानता रहेगी। यह सब करते हुए ही आपका जीवन कब व्यतीत हो जाएगा आपको पता भी नहीं चलेगा और हाथ फिर भी खाली रह जाएंगे।
मंत्र : वं
कैसे जाग्रत करें : जीवन में मनोरंजन जरूरी है, लेकिन मनोरंजन की आदत नहीं। मनोरंजन भी व्यक्ति की चेतना को बेहोशी में धकेलता है। फिल्म सच्ची नहीं होती लेकिन उससे जुड़कर आप जो अनुभव करते हैं वह आपके बेहोश जीवन जीने का प्रमाण है। नाटक और मनोरंजन सच नहीं होते।
प्रभाव : इसके जाग्रत होने पर क्रूरता, गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गणों का नाश होता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए जरूरी है कि उक्त सारे दुर्गुण समाप्त हो तभी सिद्धियां आपका द्वार खटखटाएंगी। अगले पन्ने पर कैसे जाग्रत करें मणिपुर चक्र…
मणिपुर चक्र : नाभि के मूल में स्थित रक्त वर्ण का यह चक्र शरीर के अंतर्गत मणिपुर नामक तीसरा चक्र है, जो दस दल कमल पंखुरियों से युक्त है। जिस व्यक्ति की चेतना या ऊर्जा यहां एकत्रित है उसे काम करने की धुन-सी रहती है। ऐसे लोगों को कर्मयोगी कहते हैं। ये लोग दुनिया का हर कार्य करने के लिए तैयार रहते हैं।
मंत्र : रं
कैसे जाग्रत करें : आपके कार्य को सकारात्मक आयाम देने के लिए इस चक्र पर ध्यान लगाएंगे। पेट से श्वास लें।
प्रभाव : इसके सक्रिय होने से तृष्णा, ईर्ष्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह आदि कषाय-कल्मष दूर हो जाते हैं। यह चक्र मूल रूप से आत्मशक्ति प्रदान करता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए आत्मवान होना जरूरी है। आत्मवान होने के लिए यह अनुभव करना जरूरी है कि आप शरीर नहीं, आत्मा हैं। आत्मशक्ति, आत्मबल और आत्मसम्मान के साथ जीवन का कोई भी लक्ष्य दुर्लभ नहीं। अगले पन्ने पर कैसे जाग्रत करें अनाहत चक्र…
अनाहत चक्र- हृदय स्थल में स्थित स्वर्णिम वर्ण का द्वादश दल कमल की पंखुड़ियों से युक्त द्वादश स्वर्णाक्षरों से सुशोभित चक्र ही अनाहत चक्र है। अगर आपकी ऊर्जा अनाहत में सक्रिय है, तो आप एक सृजनशील व्यक्ति होंगे। हर क्षण आप कुछ न कुछ नया रचने की सोचते हैं। आप चित्रकार, कवि, कहानीकार, इंजीनियर आदि हो सकते हैं।
मंत्र : यं
कैसे जाग्रत करें : हृदय पर संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। खासकर रात्रि को सोने से पूर्व इस चक्र पर ध्यान लगाने से यह अभ्यास से जाग्रत होने लगता है और सुषुम्ना इस चक्र को भेदकर ऊपर गमन करने लगती है।
प्रभाव : इसके सक्रिय होने पर लिप्सा, कपट, हिंसा, कुतर्क, चिंता, मोह, दंभ, अविवेक और अहंकार समाप्त हो जाते हैं। इस चक्र के जाग्रत होने से व्यक्ति के भीतर प्रेम और संवेदना का जागरण होता है। इसके जाग्रत होने पर व्यक्ति के समय ज्ञान स्वत: ही प्रकट होने लगता है।
व्यक्ति अत्यंत आत्मविश्वस्त, सुरक्षित, चारित्रिक रूप से जिम्मेदार एवं भावनात्मक रूप से संतुलित व्यक्तित्व बन जाता हैं। ऐसा व्यक्ति अत्यंत हितैषी एवं बिना किसी स्वार्थ के मानवता प्रेमी एवं सर्वप्रिय बन जाता है। अगले पन्ने पर कैसे जाग्रत करें विशुद्ध चक्र…
विशुद्ध चक्र- कंठ में सरस्वती का स्थान है, जहां विशुद्ध चक्र है और जो सोलह पंखुरियों वाला है। सामान्यतौर पर यदि आपकी ऊर्जा इस चक्र के आसपास एकत्रित है तो आप अति शक्तिशाली होंगे।
मंत्र : हं
कैसे जाग्रत करें : कंठ में संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है।
प्रभाव : इसके जाग्रत होने कर सोलह कलाओं और सोलह विभूतियों का ज्ञान हो जाता है। इसके जाग्रत होने से जहां भूख और प्यास को रोका जा सकता है वहीं मौसम के प्रभाव को भी रोका जा वल है। अगले पन्ने पर कैसे जाग्रत करें आज्ञाचक्र…
आज्ञाचक्र : भ्रूमध्य (दोनों आंखों के बीच भृकुटी में) में आज्ञा चक्र है। सामान्यतौर पर जिस व्यक्ति की ऊर्जा यहां ज्यादा सक्रिय है तो ऐसा व्यक्ति बौद्धिक रूप से संपन्न, संवेदनशील और तेज दिमाग का बन जाता है लेकिन वह सब कुछ जानने के बावजूद मौन रहता है। इस बौद्धिक सिद्धि कहते हैं।
मंत्र : ऊं
कैसे जाग्रत करें : भृकुटी के मध्य ध्यान लगाते हुए साक्षी भाव में रहने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है।
प्रभाव : यहां अपार शक्तियां और सिद्धियां निवास करती हैं। इस आज्ञा चक्र का जागरण होने से ये सभी शक्तियां जाग पड़ती हैं और व्यक्ति एक सिद्धपुरुष बन जाता है। अगले पन्ने पर कैसे जाग्रत करें सहस्रार चक्र…
सहस्रार चक्र : सहस्रार की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है अर्थात जहां चोटी रखते हैं। यदि व्यक्ति यम, नियम का पालन करते हुए यहां तक पहुंच गया है तो वह आनंदमय शरीर में स्थित हो गया है। ऐसे व्यक्ति को संसार, संन्यास और सिद्धियों से कोई मतलब नहीं रहता है।
कैसे जाग्रत करें : मूलाधार से होते हुए ही सहस्रार तक पहुंचा जा सकता है। लगातार ध्यान करते रहने से यह चक्र जाग्रत हो जाता है और व्यक्ति परमहंस के पद को प्राप्त कर लेता है।
प्रभाव : शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण विद्युतीय और जैवीय विद्युत का संग्रह है। यही मोक्ष का द्वार है।
दुनिया में बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्हें उनके जीवन में दैवीय सहायता मिलती है। किसी को ज्यादा तो किसी को कम। कुछ तो ऐसे हैं जिनके माध्यम से दैवीय शक्तियां अच्छा काम करवाती हैं। सवाल यह उठता है कि आम व्यक्ति कैसे पहचानें कि उसकी दैवीय शक्तियां मदद कर रही है या उसकी पूजा-पाठ-प्रार्थना का असर हो रहा है? इन 11 संकेतों से हम इसको महसूस कर सकते हैं-
1. अच्छा चरित्र
शास्त्र कहते हैं कि दैवीय शक्तियां सिर्फ उसकी ही मदद करती है, जो दूसरों के दुख को समझता है, जो बुराइयों से दूर रहता है, जो नकारात्मक विचारों से दूर रहता है, जो नियमित अपने इष्ट की आराधना करता है या जो पुण्य के काम में लगा हुआ है। यदि आप समझते हैं कि मैं ऐसा ही हूं तो निश्चित ही दैवीय शक्तियां आपकी मदद कर रही हैं। आपको बस थोड़ा सा इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि आप अच्छे मार्ग पर हैं और आपको ऊपरी शक्तियां देख रही हैं।
2. ब्रह्म मुहूर्त
विद्वान लोग कहते हैं कि यदि आपकी आंखें प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में अर्थात् रात्रि 3 से 5 के बीच अचानक ही खुल जाती हैं तो आप समझ जाएं कि दैवीय शक्तियां आपके साथ हैं, क्योंकि यही वह समय होता है जबकि देवता लोग जाग्रत रहते हैं। यदि आप अपने बचपन से लेकर जवानी तक इस समय के बीच उठते रहे हैं तो समझ जाएं कि दैवीय शक्तियां आपके माध्यम से कुछ करवाना चाहती हैं या कि वे आपको एक अच्छी आत्मा समझकर यह संकेत दे रही हैं कि अब उठ जाओ। यह जीवन सोने के लिए नहीं है। आपको दुनिया में बहुत कुछ करना है। यह भी कहा जाता है कि सत्व गुण प्रधान लोग इस काल में स्वत: ही उठ जाते हैं। आयुर्वेद के अनुसार इस समय बहने वाली वायु को अमृततुल्य कहा गया है। यह अमृत वेला होती है। कहते हैं कि इस काल में दुनिया के मात्र 13 प्रतिशत लोगों की ही नींद खुलती है।
3. सपने में देव दर्शन
यदि आपको बारंबार मंदिर या किसी देव स्थान के ही सपने आते रहते हैं। सपने में आप आसमान में ही उड़ते रहते हैं या सपने में आप देवी-देवताओं से वार्तालाप करते रहते हैं तो आप समझ जाइए कि दैवीय शक्तियां आप पर मेहरबान हैं।
4. पूर्वाभास
यदि आपको आने वाली घटनाओं का पहले से ही ज्ञान हो जाता है या आपको पूर्वाभास हो जाता है तो आप समझ जाइए कि दैवीय शक्तियों की आप पर कृपा है।
5. पारिवारिक प्रेम
आपकी पत्नी, बेटा, बेटी और आपके सभी परिजन आपकी आज्ञा का पालन कर रहे हैं, वे सभी आपसे प्यार करते हैं एवं आप भी उनसे प्यार कर रहे हैं तो आप समझ जाइए कि दैवीय शक्तियां आप से प्रसन्न हैं।
6. भाग्य से भी तेज
जीवन में आपको अचानक से लाभ प्राप्त हो जाता है। आपके किसी भी कार्य में किसी भी प्रकार की आपको बाधा उत्पन्न नहीं होती है और सभी कुछ आपको बहुत आसानी से मिल जाता है, तो आप समझ जाइए कि दैवीय शक्तियां आपकी मदद कर रही हैं।
7. सुगंधित वातावरण का अहसास
यदि कभी-कभी आपको यह महसूस होता है कि मेरे आसपास कोई है या आपको बिना किसी कारण ही अपने आसपास सुगंध का अहसास हो तो समझ जाइए कि अलौकिक शक्तियां आपके आसपास आपकी मदद के लिए हैं।
8. सुहानी हवा
आप पूजा कर रहे हैं और यदि आपको लगे कि अचानक सुहानी हवा का झोंका या प्रकाश पुंज आ गया और शरीर में सिहरन दौडऩे लगे। ऐसा तो पहले कभी हुआ नहीं तो समझिए कि देवी या देवता आप पर प्रसन्न हैं।
9. ठंडी हवा का घेरा
भूमि पर रहते हुए भी कभी-कभी आपको यह अहसास हो कि मेरे आसपास बादल या ठंडी हवा का एक पुंज है जिसने मुझे घेरा हुआ है तो आप समझ जाइए कि अलौकिक या दैवीय शक्ति ने आपको घेर रखा है। ऐसा अक्सर बहुत ज्यादा पूजा-पाठ करने वाले व्यक्ति के साथ होता है।
10. रोशनी का पुंज
अचानक ही आपको तेज रोशनी का पुंज दिखाई दे जिसकी कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते या आपको अचानक ही कानों में मधुर संगीत सुनाई दे और आप आश्चर्य करें कि यहां आसपास तो कोई संगीत बज ही नहीं रहा फिर भी वह कानों में सीटी बजने की तरह सुनाई दे, तो आप समझ जाइए कि आप दैवीय शक्ति के सान्निध्य में हैं। ऐसा अक्सर उन लोगों के साथ होता है, जो निरंतर ही अपने इष्टदेव का मंत्र जप कर रहे होते हैं।
किसी की आवाज सुनाई देना
आप रात्रि में गहरी नींद में सो रहे हैं और आपको लगता है कि किसी ने मुझे आवाज दी और आप अचानक ही उठ जाते हैं, लेकिन फिर आपको आभास होता है कि यहां तो कोई नहीं है। लेकिन आवाज तो स्पष्ट थी। ऐसा आपके साथ कई बार हो जाता है तो आप समझ जाइए कि आप पर किसी अलौकिक शक्ति की मेहरबानी है। ऐसे में आप हनुमानजी का ध्यान करें
कुछ दिनों पहले मुझे इस प्राचीन घडी का चित्र प्राप्त हुआ जिसमें १ से १२ अंकों के स्थान पर विभिन्न देवताओं के नाम लिखे थे। वो एक अबूझ पहेली की भांति थी किन्तु अचानक गौर करने पर मुझे इसका रहस्य समझ में आ गया। मैं इसपर पहले ही एक लेख लिखना चाहता था किन्तु उससे पहले इसी प्रश्न को मैंने अपने फेसबुक पेज पर भी लोगों से पूछा और हमारे एक पाठक श्री तरुण विश्वकर्मा ने इसका सही उत्तर भी बताया। तो अपने इस लेख में मैं तरुण जी का भी योगदान मानते हुए इसका शुभारम्भ करते हैं।
जैसा कि आप देख सकते हैं कि इस घडी में १ से १२ के स्थान पर क्रमशः ब्रह्म, अश्विनौ, त्रिगुणा, चतुर्वेदा, पञ्चप्राणा:, षड्रसाः, सप्तर्षयः, अष्टसिद्धयः, नवद्रव्याणि, दशदिशः, रुद्राः एवं आदित्याः लिखा है। ये सभी देवताओं अथवा गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं और जिस स्थान पर वे हैं उनकी संख्या भी उतनी ही है। इनमें से १२ आदित्य, ११ रूद्र एवं २ अश्विनीकुमारों की गिनती हिन्दू धर्म के प्रसिद्ध ३३ कोटि देवताओं में की जाती है। इनमें एक समूह ८ वसुओं का भी है जो इस चित्र में वर्णित नहीं है। आइये इसे इसे समझते हैं।
ब्रह्म – हमारे पुराणों में आदि एवं अंत ब्रह्म से ही माना गया है। ब्रह्म एक ही होता है जो सत्य एवं सनातन है। कहा गया है – एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति। अर्थात, ब्रह्म एक ही है, दूसरा कोई नहीं।
अश्विनौ – ये अश्विनीकुमारों का प्रतिनिधित्व करता है जो दो होते हैं – नासत्य एवं दसरा। नासत्य सूर्योदय एवं दसरा सूर्यास्त का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये ३३ कोटि देवताओं में से एक हैं। यही दोनों भाई महाभारत में माद्रीपुत्र नकुल एवं सहदेव के रूप में जन्मे थे।
त्रिगुणा – ये प्रत्येक जीव के तीन गुणों – सतोगुण, रजोगुण एवं तमोगुण का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन तीनों गुणों का मिश्रण एवं एक गुण की प्रधानता सभी जीवों में होती है। केवल श्रीहरि विष्णु इन तीन गुणों से परे, अर्थात त्रिगुणातीत माने जाते हैं।
चतुर्वेदा – ये परमपिता ब्रह्मा द्वारा रचित चारो वेदों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये हैं – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद।
पञ्चप्राणा: – ये जीवों के पांच प्राणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। मानव शरीर को ५ प्राण एवं ५ उप-प्राण में विभक्त किया गया है। ५ मुख्य प्राण हैं – अपान, समान, प्राण, उदान एवं व्यान। उसी प्रकार ५ उप-प्राण हैं – देवदत्त, वृकल, कूर्म, नाग एवं धनञ्जय।
षड्रसाः – ये छह रसों का प्रतिनिधित्व करते हैं (षड्रसाः = षड + रस)। किसी भी वास्तु का स्वाद इन्ही ६ रसों के कारण अलग-अलग होता है। ये हैं – मधुर (मीठा), अम्ल (खट्टा), लवण (नमकीन), कटु (कड़वा), तिक्त (तीखा) एवं कसाय (कसैला)।
सप्तर्षय: – ये सप्तर्षियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। वैसे तो प्रत्येक मन्वन्तर में सप्तर्षि अलग-अलग होते हैं किन्तु प्रथम स्वयंभू मनु के काल के सप्तर्षियों, जो ब्रह्मदेव के मानस पुत्र हैं, को प्रधानता दी जाती है। ये हैं – मरीचि, अत्रि, अंगिरस, पुलह, क्रतु, पुलस्त्य एवं वशिष्ठ।
अष्टसिद्धयः – ये अष्ट सिद्धियों का प्रतिनिधित्व करती है। महाबली हनुमान के पास अष्ट सिद्धि थी। इसके बारे में कहा गया है – अणिमा महिमा चैव लघिमा गरिमा तथा। प्राप्तिः प्राकाम्यमीशित्वं वशित्वं चाष्ट सिद्धयः।। अर्थात, अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, इशित्व और वशित्व – ये ८ सिद्धियाँ “अष्टसिद्धि” कहलाती हैं।
नवद्रव्याणि – ये नौ निधियों का प्रतिनिधित्व करती है। महावीर हनुमान एवं यक्षराज कुबेर इन नौ निधियों के स्वामी हैं, किन्तु जहाँ कुबेर इन नौ निधियों को किसी को प्रदान नहीं कर सकते, हनुमान इसे दूसरे को प्रदान कर सकते हैं। हनुमान की नौ निधियां हैं – रत्न किरीट, केयूर, नूपुर, चक्र, रथ, मणि, भार्या, गज एवं पद्म। कुबेर की नौ निधियां हैं – पद्म, महापद्म, नील, मुकुंद, नन्द, मकर, कच्छप, शंख एवं खर्व।
दशदिशः – ये दसो दिशाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। प्रत्येक दिशा के स्वामी को दिक्पाल कहते हैं। ये हैं – पूर्व (इंद्र), आग्नेय (अग्नि), दक्षिण (यम), नैऋत्य (सूर्य), पश्चिम (वरुण), वायव्य (वायु), उत्तर (कुबेर), ईशान (सोम), उर्ध्व (ब्रह्मा) एवं अधो (अनंत)।
रुद्राः – ये ११ रुद्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये सभी भगवान शंकर के रूप माने जाते हैं और ३३ कोटि देवताओं में स्थान पाते हैं। ये हैं – शम्भू, पिनाकी, गिरीश, स्थाणु, भर्ग, भव, सदाशिव, शिव, हर, शर्व एवं कपाली।
आदित्याः – ये १२ आदित्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन्ही आदित्यों को हम आम भाषा में देवता कहते हैं। ये महर्षि कश्यप एवं दक्षपुत्री अदिति के पुत्र हैं हुए ३३ कोटि देवताओं में स्थान रखते हैं। ये हैं – इंद्र, धाता, पर्जन्य, त्वष्टा, पूषा, अर्यमा, भग, विवस्वान (सूर्य), अंशुमान, मित्र, वरुण एवं विष्णु (वामन)।