भारत में अब तक लॉकडाउन बड़े देशों की तुलना में सफल रहा है और तमाम विशेषज्ञ जो कह रहे थे कि जून के अंत तक भारत में 30 से 50 लाख मरीज होंगे उस आंकड़े से भारत काफी दूर है जो राहत की बात है.
लेकिन हम और आप सब ये बात भी जानते हैं कि भारत में लॉकडाउन का पालन उस तरह नहीं किया गया, जैसे किया जाना चाहिए था और सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखने में लापरवाहियां बरती गयीं.
हर चरण में कुछ ऐसी घटनाएं रहीं जिन्न्होंने सोशल डिस्टेंसिंग का मजाक बना दिया..
१. मार्च 2020 में दिल्ली में तबलीगी जमात की बैठक
२. प्रवासी मजदूरों का सड़कों पर उतरा रेला
३. लॉकडाउन में अस्थायी ढील के बाद शराब की दुकानों के बाहर भारी भीड़
सबसे बड़ी ट्रेजेडी इसमें प्रवासी मजदूरों के साथ हुई..जिन जिन राज्यों में वो कार्यरत थे उन राज्यों में अधिकारी वेतन, आश्रय और भोजन के रूप में कोई प्रोत्साहन नहीं दे सके, जिसके कारण उन्हें भारी तादाद में सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होना पड़ा। और जब राज्य प्रवासी मजदूरों का इंतजाम करने में असफल साबित हो रहे थे तभी उन्हें घर तक पहुंचाने के लिए सुचारु इंतजाम किए जाने चाहिए थे जैसे अभी किए गए हैं।
इस बीच सरकार ने एक काम जो अच्छा किया वो ये कि विदेश में बसे लगभग 10 लाख लोगों को लाने में पूरी मुस्तैदी बरती गयी..ये संख्या कुवैत पर इराक के आक्रमण के बाद लाए गए भारतीयों के मुकाबले बहुत अधिक संख्या है और भारत-पाक बंटवारे 1947-48 में भारत आए 70 लाख लोगों के बाद दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है।
लॉकडाउन के चरणों ने भले ही महामारी को कण्ट्रोल में रखा, लेकिन देश को/समाज को इसकी भारी आर्थिक कीमत चुकानी पड़ी है। देश में इकोनॉमिक एक्टिविटी लगभग बंद सी ही हैं….सभी कारोबारी चोट झेल रहे हैं, लाखों दिहाड़ी कामगार गरीबी में फंस गए हैं और बेरोजगारी अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गई है।
कोविड-19 से निपटने आत्मनिर्भर भारत की रणनीति बनाते समय ये बातें मुख्य रूप से याद रखी जानी चाहिए :
- कोरोना कम से कम 2020 तक रहेगा ही.. जब तक इसकी दवाई नहीं बन जाती तब तक सोशल डिस्टेंसिंग का पालन तो करना ही होगा.
- हमें जिंदगी और आजीविका दोनों बचाने पर जोर देना होगा। अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना प्राथमिकता होनी चाहिए..और समय-समय पर जरूरत के मुताबिक लॉकडाउन दोबारा लागू होने के लिए तैयार रहना होगा..
- भारत में कोरोना का विस्तार uneven है….मामले महानगरों में अधिक रहे हैं और करीब आधा देश और अधिकतर ग्रामीण भारत इससे बचा हुआ है..
- अधिकतर मामलों में बीमारी के हल्के लक्षण रहे हैं और अस्पताल में भर्ती होने वाले बहुत कम लोगों को आईसीयू में भर्ती किया गया था..
- चीन और अमेरिका के बीच अविश्वास इस महामारी के कारण चरम पर है और वैश्वीकरण के बजाय स्थानीयकरण की मुहिम भी जोरों पर है। अमेरिका तथा जापान जैसे देशों के कारोबार को नया ठिकाना मुहैया कराने का मौका मिल रहा है। मगर हमें ध्यान रखना चाहिए कि आने वाले हफ्तों में चीन बाकी दुनिया के साथ ज्यादा अड़ियल रुख दिखाएगा..
- आर्थिक मंदी के कारण तेल की कीमतें भी गिर गई हैं। भारत के लिए यह एक लिमिट तक वरदान है क्योंकि भारत को भारी मात्रा में तेल आयात करना पड़ता है। मगर एक लिमिट के बाद इसका यह नुकसान है कि खाड़ी से हमारे प्रवासियों द्वारा घर भेजी जा रही बेहद महत्वपूर्ण विदेशी मुद्रा आनी खत्म हो जाएगी क्योंकि उन लोगों की नौकरियों पर संकट खड़ा हो जाएगा। साथ ही उन्हें बड़ी तादाद में भारत लौटना भी होगा, जिससे रोजगार पर बोझ बढ़ जाएगा, जो पहले ही बोझ तले दबा है..
- भारत इस बात से संतुष्ट हो सकता है कि उसके पास खाद्यान्न का बड़ा भंडार और भारी विदेशी मुद्रा भंडार तो है ही. आने वाले महीनों में मुफ्त खाद्यान्न वितरण कार्यक्रम के बावजूद अनाज की कमी नहीं आएगी। अधिकतर ग्रामीण भारत समेत करीब आधा देश वायरस से प्रभावित नहीं हुआ है..
- देश इस बात से भी संतोष महसूस कर सकता है कि उसके मेडिकल सेक्टर और मेडिकल/पैरामेडिकल स्टाफ ने महामारी के दौरान शानदार काम किया है। साथ ही अक्सर रेलवे, बैंक, विमान और डाक सेवा जैसी जिन सेवाओं का आम दिनों में खास जिक्र नहीं किया जाता, संकट के दिनों में उन्होंने जीवनरक्षक सेवाओं का काम किया है और सशस्त्र बल हमेशा की तरह मुस्तैद रहे हैं.
- लॉकडाउन के चलते प्रदूषण के स्तरों में नाटकीय गिरावट आई, जिससे हमें एक बार फिर ताजी हवा, साफ नदियों और नीले आसमान का लाभ और आनंद मिला है। इसने हमें बिना सोचे-विचारे अंधाधुंध खपत में लिप्त रहने के बजाय जरूरतें भर पूरी करने के पारंपरिक भारतीय मूल्यों की याद भी दिलाई है.
आगे की लड़ाई के लिए एक बात बिलकुल साफ़ है कि कोरोना से निपटने के साथ ही भारत को अपनी अर्थव्यवस्था को फौरन पटरी पर लाने पर भी ध्यान देना होगा…एक को नजरअंदाज कर केवल दूसरे पर ध्यान देना आत्मघाती होगा.

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