प्रेम पानी सा है ,
शालीन अपनी धुन में बहता हुआ ,
इसको किसी से गुरेज नहीं , ना ही किसी से बैर ,
ना दो रास्ते तब भी बिना शिकायत अपनी मंज़िल खोजता हुआ , बहता ही चला जाता है।
मिले जो तमाम मुश्किलें , ठहर , बढ़ा अपना आकर , एकत्रित हो , आगे बढ़ ही जाता है ।
अब देखो ज़रा ,
हर कोई तैरना भी चाहता है , भीगना भी चाहता है बारिश में निर्वस्त्र होकर फिर या तो कोई भीग जाता है या कोई शर्म से रह जाता है या किसी को प्रेम के बाद के नुकसान भीगे कपड़ो की चिंता रोक लेती है तो कोई झूम जाता है अपनी मस्ती में ।
जो मस्तमोले हैं , बचकाने हैं , भीग रहे हैं , बाहें फैलायें , छपाक करते , ज़ोर से कूदी मार , कुछ समझदार से दिखने वाले मूर्ख खड़े हैं किसी छाव की ओट में ।
बारिश का ऐसा कोई अपमान करता है भला ।
किसी को लगा हो कि नफरत की धूप से सुखा दिया ,
तुम अंजान हो ,
देखो ,
प्रेम विद्यमान है ,
ना ! पानी सा नहीं ,
अब भाप बनकर बिखरा हुआ ,
गुस्से से भरा ,
अब बहता नहीं बादल बन उड़ जाता है , कहीं और बरस जाने को ।
कहीं और जाना चाहता नहीं पर मजबूरी है , जो तुम्हें होती कद्र तो क्या उड़ जाने देते । खैर कोई बात नहीं ,पर वो ग़लती कर बैठे जो पानी को भाप बना बैठे , भाप हिला देती है वर्चस्व के किले । बचाना हो अगर किले , उसे शालीनता से बह जाने दो , ना दो रास्ते , माँगे भी कब थे उसने ।
© जतिन त्यागी
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