कलाकार अपनी इमेज का ही कमाता है और अपनी इमेज का ही मारा होता है , पर अच्छी बात ये है कि वह अपनी इमेज पर लोगों को दोष नहीं देता और उस पर काम करता है ।
उदाहरणतः इमरान हाशमी ने अनगिनत फ़िल्म की हैं , पर लोग उन्हें किसर के रूप में जानते हैं , जबकि की कई फिल्मों में उन्होंने किस सीन नहीं दिए वहीं बात करें रनवीर कपूर की तो क्या हम उसे पुलिस की वर्दी में एक्शन करते हुए इमेजिन भी कर सकते हैं क्या ?
जबाब है नहीं । क्योंकि उसकी पुरानी फिल्मों की वजह से उसकी एक इमेज बनी है ।
क्या वह इस इमेज का लोगों को दोष दे सकता है क्या ? जबाब फिर है ‘नहीं’ ।
मैने अक्षय कुमार का एक इंटरव्यू देखा था जिसमें वह कह रहे थे कि “मैं हमेशा एक जैसी फिल्में नहीं करना चाहता , कभी हास्य , कभी देशभक्ति , कभी एक्शन , कभी देशभक्ति क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया तो फिर मेरी इमेज वैसी ही बन जायेगी और लोग मुझे बाकी रोल में देखना पसंद नहीं करेंगे , यहाँ भी खेल इमेज का है । रामानंद सागर की रामायण के पात्रों को बाद में मूवी या कोई नया सीरियल मिलना बंद हो गया था क्योंकि लोगों के मन में उनकी एक इमेज बन गई थी भगवान के रूप में । जॉनी लीवर हो या ब्रह्मानंदम इतने मंझे हुए कलाकार हैं , पर क्या लोग उन्हें एक्शन करते हुए इमेजिन कर सकते हैं क्या ? नहीं रख सकते क्योंकि उनकी इमेज ही वैसी ही ।
तो क्या ये सभी लोग जनता को दोषी ठहरा सकते हैं उनकी इमेज के बारे में ? बिल्कुल नहीं ।
बल्कि उनके पास अपनी इमेज सुधारने के अलावा कोई विकल्प नहीं है ।
इसीलिए कलाकार अलग अलग फिल्में करते हुए , इमेज के बंधन से बचते हैं । धारावाहिक में कार्य कर रही अदाकारा भी ऐसा ही करती हैं ।
अब मैं ये इमेज की बात क्यों कर रहा हूँ ?
अब बात ये है कि , चाहे आतंकवाद हो या पिछले दिनों कुछ जाहिलों के द्वारा किया गया डॉक्टर के ऊपर पथराव , उन पर थूकना हो या अस्पताल में नग्न घूमना ये एक निश्चित वर्ग से थे और उनको बहकाया गया होगा ऐसा कह सकते हैं , पर क्या इससे एक प्रकार की इमेज बनी ? एक निश्चित वर्ग में ? एक वर्ग के लिए ? अब आप बहस कर सकतें है कि इमेज बनना ग़लत है , पर मैं कहूँगा ध्यान इस पर दिया जाए कि इमेज बनी या नहीं ? तो आपको मानना पड़ेगा कि इमेज तो बनी है ,
दुनिया में बहुत कम प्रतिशत के साँप विषैले हैं , बाकी के साँप विषैले नहीं है और आम ज़िन्दगी जीते हैं बल्कि की इंसान के आसपास पल रहे बाकी हानिकारक जीवों को खा कर इंसान का बचाव ही करते हैं । पर जब भी आप किसी साँप को देखते हैं तो आपके मन मे क्या ख़्याल आता है ? क्या आप उसे छू लेते हैं या पहले अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं ? अगर सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं और दूर से डरते हैं तो क्या उन सापों को नाराज़गी हो सकती है जो विषैले नहीं है बल्कि अच्छे हैं ,और प्रकृति की मदद करते हैं ?
वहीं बारिश के दिनों में कभी-कभी कोई बटन करंट मारती है तो आप उस बोर्ड की हर बटन को शक की निगाह से देखते हैं क्योंकि व्यक्ति सबसे पहले अपनी सुरक्षा , अपने परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करता है , वही हो रहा है ।
यहाँ मुंस्लिमों को अपनी इमेज तोड़ने के लिए काम करना होगा , बल्कि बिना इस बात के आरोप के की हमें ग़लत समझा जा रहा है । क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता है तो गेँहू के साथ घुन पिसेगा , अब या तो घुन हट जाए वहाँ से या फिर पिसे , विकल्प उसके पास हैं । आप इस समाज सुधार की बात को राजनीतिक या धार्मिक रूप दे सकते हैं और मुझे घसीट सकते हैं , पर अगर मेरी बात मुस्लिम वर्ग के बड़े बुजुर्गों के पास पहुँच रही है तो मैं विनती करता हूँ कि बिना किसी को दोष दिए , अपनी इमेज पर काम करना शुरू कीजिए वो भी बिना विलंब के , क्योंकि आप वैसे भी लेट हैं , और इसके लिए आपको मसक्क्त भी करनी होगी जमकर ।
वरना आने वाले दिन और भी विकट हो सकते हैं , कृपया इस बात को धमकी नहीं अपितु एक सुझाव माने ।
और ध्यान रहे , ग़लती की स्वीकारिता पहला पढ़ाव है उसे सुधारने का , जब तक आप स्वीकारेंगे नहीं , चीज़ें नहीं सुधर सकतीं ।
अगर मैंने एक समाज सुधारक होते हुए, विवेक का इस्तेमाल ना करते हुए ये पोस्ट धार्मिक भाव से लिखी है तो मैं अपने गुरु महादेव से विनती करता हूँ कि मेरे अपराध को क्षमा ना करे 🙏🙏
© जतिन त्यागी

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