एक छोटा मकां था दिल के दरमियाँ ,
जो केवल तुम्हारा था ,
मकां जो छोटा था , तुम्हें शिकायत थी ।
तुम्हें शिकायत थी मकां छोटे होने से ना कोई आ पाता ना कोई जा पाता ,
अब क्या कहूँ ,
फिर रहा केवल मकां ,
तुम जो ख़ाली कर गए ,
दिल ज़ख्म कर गया ,
तो क्या हुआ ?
ज़ख्म तो भरना था , भर गया , भर ही गया , धीरे-धीरे ही सही ।
थोड़े ज़ख्मों के निशा हैं , पर छोटे मकां के ज़ख्मों को कौन देखता है ।
छोटे मकां दब जाते हैं बड़े मकां के आगे ,
चलो जाने दो ये भी कोई बात है करने की ,
सुना है किसी बड़े दिल के बड़े मकां में रहते हो ,
खैर ठीक है , मुझे क्या ?
पर बताओ तो सही ,
बड़े मकां से ख़ुशी तो होगी ,
है कि नहीं ?
क्यों ना होगी भला ?
होनी ही चाहिए ,
पर फिर भी तुम्हें ज्ञात हो ,
इन बड़े दिल के बड़े मकां के कई दरवाज़े होते हैं ,
एक वो जिससे तुम गई हो और बाकी वो जो पता होते हैं सिर्फ़ मकां वाले को ,
मकां वाला जिसे चाहे लाता है , जिसे चाहे ले जाता है , बड़े मकां वाले ऐसा करते हैं ,
पर उपाय है , करना !
या तो तुम पूरा दिल का मकां घेर लो , या तो वा तो नहीं ,
घेरना ही होगा ,
जो घेर ना पाओगी तो मकां वाला भाड़े पर भी चढ़ा देता है ख़ाली मकां को ।
ख़ाली मकां कोई छोड़ता है भला , वो भी बड़ा मकां ।
खैर फिर छोड़ो तुम्हें मकां तो मिला ।
पर फिर भी सोचना ,
मिला क्या जो चाहिए था ,
या केवल मकां मिला ।
गर सोचो लौटने का तो सोचना भी मत ,
मकां छोटा था तो क्या हुआ मकां का भी गुरुर हैं ,
किवाड़ भी गुस्से में हैं ,
सुना है मैंने बतियाते उन्हें ,
जो अब आये झुककर ही आये ।
वरना ना आये ,
ना ही आये ।
मैं भला , मेरे दिल के दरमियाँ मकां भला ।।
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