एक था कप और एक थी बशी ,
दोनों बड़े ही अच्छे दोस्त थे । दोनो साथ रहते , साथ खेलते , जहाँ भी जाते साथ जाते ।
हर वो चीज़ जो कप में होती , बशी से होकर गुज़रती , कप थोड़े गर्म स्वभाव का था , वहीं बशी थोड़ी शालीन थी , थी इतनी शालीन की कप का भार लिये चलती । इन्हीं गुणों से बशी , बुजुर्गों और बच्चों की चहेती थी ।
पर कुछ कहो थे एक दूसरे के पूरक , अपना काम चला लेते थे । बढ़िया से दिन गुजरते रहे , फिर एक दिन ना जाने किसकी नज़र लग गई उनकी दोस्ती पर , आवाज़ आई “बशी रहने दो , कप ही ठीक है” ।
बशी पहले तो ठिठक गई , पर कप को रोक भी तो नहीं सकती थी , जो उसे भेज दिया , पर उसे क्या मालूम था ये एक दिन की बात नहीं है । अब बशी घर में ही रहती है । कप भी ज़िम्मेदारी से बंधा है , जो अकेला ही जाता है , बशी अलमारी की जाली से उसे देखते रहती है , किसी प्रेमिका की तरह , जब जब कप बाहर होता है बशी को चिंता लगी रहती है ,गर्म स्वभाव जो है उसका । जैसे ही अलमारी की चिटकनी की आवाज़ आती है , बशी ख़ुश हो जाती है ।
कप वैसे तो कई बार पहुँच जाता है पर कई बार दोबारा पहुँच ही नहीं पाता है ।
बशी वहीं हैं , कप बदलते जा रहे हैं ।
कप जो बदले , बशी फिर कभी बाहर निकली ही नहीं । बैठी है कोने में , अंत के इंतज़ार में ।

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