“आशाएं कैसे बनी आकांक्षाएं”

दोपहर का वक्त था , कोई तीन साढ़े तीन बज रहे थे । सभी अपने अपने काम में व्यस्त थे , बाबूजी भी सोफे पर लेटे-लेटे टीवी देख रहे थे । एकाएक बाबूजी के मोबाइल पर मैसेज आता है , एक आसामान्य रिंगटोन के साथ ,किसी पुराने फ़ोन की घंटी की तरह । उस मैसेज के साथ घर के सारे मोबाइल में मैसेज आने की रिंगटोन बजती है केवल आकांक्षा के मोबाइल को छोड़कर । आकांक्षा सबसे छोटी बहु , दो माह पहले ही तो शादी हुई है ।
बाबूजी बिना ये देखे की मोबाइल कहाँ है , सोफे को टटोलते हुए मोबाइल ढूँढ रहे थे और पूरा ध्यान टीवी की तरफ़ ही था । जब तक ढूँढते , बाकी लोगों के मोबाइल पर चैटिंग शुरू हो चुकी होती । बाबूजी अब भी मोबाइल ढूँढ रहे थे , वो तब तक बिना देखे ढूँढने का प्रयास करते रहे जब तक कि टीवी में एड ना आगया । घंटी की पहचान के हिसाब से सीधे वाट्सएप में घुसे । एक ही मैसेज था जो अनरीड था , वो भी नवग्रह ग्रुप का । ग्रुप में पूरे नौ सदस्य थे उनके दो बेटे , दो बहु जिसमे की एक आकांक्षा , दो बेटी , दो दामाद और वो ख़ुद ।
जैसे ही मैसेज पर क्लिक किया , एक डाउनलोडिंग के चकरे के साथ फ़ोटो डाउनलोड हो गई । बाबू जी ने जैसे ही फ़ोटो को देखा एक बार आकांक्षा को देख सीधे छोटे बेटे के कमरे की और भागे ।
आकांक्षा किचन में ही काम कर रही थी । एक दम से बड़े भैया और भाभी भी कमरे से बाहर आ गए ।
किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था ।
पर मैसेज भेजने वाली आकांक्षा अब भी शांत थी ।
सारे लोग घर के एक कमरे में इकट्ठे हो चुके थे , दोनों बेटों की फ़ोन की घंटी बज रही थी ।
बस सामान्य थी तो आकांक्षा , वो भी अपने किचन में ।
सब एक दूसरे को देखे जा रहे थे , कोई किसी को कुछ नहीं बोल रहा था ।
फिर थोड़ी देर चर्चा होने के बाद ये निर्णय हुआ कि आकाश आकांक्षा से इस बारे में बात करेगा वो भी सबके सामने ।
सभी लोग हॉल में आगये , सभी एक दूसरे से नज़रे छिपा रहे थे और इंतज़ार कर रहे थे आकाश के बोलने का ।
इतने में आकाश ने किचन में काम कर रही आकांक्षा को आवाज़ लगाई ।
” ये क्या है आकांक्षा ?”
आती आकांक्षा को गुस्से में मोबाइल दिखाते आकाश ने कहा ।
अब सभी आकांक्षा के बोलने का इंतज़ार कर रहे थे , जैसे किसी कटघरे में कोई मुजरिम खड़ा हो और उसे सजा होने वाली हो ।
” चुटकुला है ” आकांक्षा ने बहुत ही सामान्य होते हुआ कहा
ऐसा लगा मानो किसी तेज भागते बॉलर की गेंद पर किसी बल्लेबाज़ ने शालीनता से प्लेट कर दी हो ।
सबको अब भी आश्चर्य हो रहा था कि जिस बात से पूरा परिवार सकते में आ गया उसको आकांक्षा इतना सामान्य क्यों मान रही है ।
“बेटा क्या आपको लगता है ऐसे चुटकुले आपको भेजने चाहिए ?
स्त्री होकर इनका मतलब नहीं जानती हो ?
या मर्यादा भूल गई हो ? “
बाबूजी ने आकाश को साइड कर एक साथ तीन सवाल दाग कर मोर्चा संभाला ।
अब बारी थी तो आकांक्षा की ।
” बाबूजी में जानती हूँ , और मैंने ये जानबूझकर किया है , ताकि हम इस बारे में बात कर सकें “
जैसे ही आकांक्षा ने कहा बाकी लोग सकते में आ गए , उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि हो क्या रहा है ।
” बाबूजी सुबह की ही बात है बड़े भैया ने ग्रुप पर एक मैसेज भेजा था जिसमें पड़ोसन की खूबसूरती और उससे नैन मटक्का पर एक चुटकुला था , सभी ने उस पर हँसी भरी स्माइली भेजी थी जिसमें आप भी थे । अब मैने भी तो वही किया है , बस यहाँ पड़ोसन नहीं पड़ोसी है , उससे नैन मटक्के की बाते हैं , तो दोनों चुटकुले तो एक ही हुए हैं । फिर इस पर गुस्सा क्यों ? “
बाबूजी मैं जानती हूँ ये वर्षों से चलता आया है कि पुरूष की ज़िम्मेदारीया निर्धारित हुई ही नहीं है , वो पड़ोसन पर चुटकुले कर सकता है , वो साली को आधी घर वाली कह सकता है , उसकी गैलरी में लड़कियों के स्तनों की फ़ोटो होती हैं , हिप्स पर चुटकुले होते हैं पर ये ग़लत है । मैं यह नहीं कह रही हूं कि , ये अधिकार महिला को भी मिले ! पर अगर कल को हम देवर को आधा घर वाला कहने लगे तो क्या होगा ? “
अगर हमारी गैलरी पुरुष के निज़ी अंगों की फ़ोटो से भरी रहें तो क्या होगा ? “
“बाबूजी जो ग़लत है वो ग़लत है , इससे कोई फर्क नहीं पढ़ता की कितने लोग उसे कर रहे हैं और कितने उसे स्वीकार कर रहे हैं , घर में बच्चे बड़े हो रहे हैं , उन दोनों भाई बहनों को भी सिखाना होगा कि बराबर होना असल में क्या है , मैं तो भतीजे बिट्टू को भी ऐसा कहकर बड़ा नहीं करना चाहती कि तुम मर्द हो और मर्द रोते नहीं , मर्द भी रो सकता है और कमज़ोर पड़ सकता है , उसे हर मुसीबत अकेले संभालने की जरूरत नहीं है , और वहीं बिट्टी को भी समझाना चाहती हूँ कि मर्द होना भी आसान नहीं है , उसका रोना उसकी कमज़ोरी नहीं है ।”
ऐसा कह कर वो थोड़ी ख़ामोश हो गई ।
थोड़ी रुकी और फिर बोली
“मैं केवल यही समझाना चाह रही थी , अगर आपको मेरा तरीका बुरा लगा हो तो मैं माफी माँगती हूँ”
ऐसा कहते हुए आकांक्षा ने दोनों हाथ जोड़ लिए ।
उसे जुड़े हाथ देख सभी की निगाहें झुकी हुई थीं ,
पुरुषवादी समाज की अर्थी सज रही थी उधर , बिट्टू किचन में चाची की बची हुई सब्जियां काट रहा था तो बिट्टी , बिट्टू की कार के साथ खेल रहा था ।
उधर बाबूजी ने आकांक्षा के सर पर हाथ रखा और आकाश की तरफ़ देख मुस्कुरा दिए , उधर बड़े भैया भी बिट्टी को देख मुस्कुरा रहे थे ।
ख़ामोश था तो बस ग्रुप ।

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